भारतन्यूज़ – टॉप हेडर
News Menu Bar

Foreign Medical Licensing Exams: एमबीबीएस के बाद अटका विदेश में डॉक्टरी का...


Last Updated:

Foreign Medical Licensing Exams: एमबीबीएस पूरा करने के बाद विदेश में प्रैक्टिस का सपना देख रहे हजारों भारतीय डॉक्टरों के सामने संकट की स्थिति आ गई है. अंतर्राष्ट्रीय मान्यता (WFME) की प्रक्रिया अटकने की वजह से मेडिकल स्टूडेंट्स USMLE और PLAB जैसी विदेशी लाइसेंसिंग परीक्षाएं नहीं दे पा रहे हैं.

MBBS के बाद अटका विदेश में डॉक्टरी का सपना, नहीं दे पा रहे USMLE-PLAB परीक्षाZoom

Foreign Medical Licensing Exams: भारतीय मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए विदेश में डॉक्टरी कर पाना आसान नहीं है

नई दिल्ली (Foreign Medical Licensing Exams). भारत में हर साल हजारों युवा दिन-रात एक करके एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करते हैं. इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे डॉक्टर्स भी होते हैं, जो आगे की पढ़ाई या डॉक्टरी की प्रैक्टिस के लिए अमेरिका (USMLE) या ब्रिटेन (PLAB) जैसे देशों का रुख करना चाहते हैं. लेकिन इस समय देश के हजारों युवा डॉक्टरों का यह सपना एक प्रशासनिक अड़चन की वजह से बीच में ही अटक सा गया है.

दरअसल, वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेडिकल एजुकेशन (WFME) से भारतीय मेडिकल कॉलेजों की मान्यता प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाई है. इस अंतरराष्ट्रीय संस्था से मान्यता न मिलने के कारण विदेशी परीक्षा एजेंसियां भारतीय एमबीबीएस डिग्री धारकों के आवेदन स्वीकार नहीं कर रही हैं. इसकी वजह से लाखों रुपये खर्च करके विदेश में डॉक्टरी की तैयारी कर रहे मेडिकल स्टूडेंट्स भारी असमंजस और तनाव की स्थिति में हैं. पढ़िए पूरी रिपोर्ट.

भारतीय मेडिकल स्टूडेंट्स विदेशी लाइसेंसिंग परीक्षा क्यों नहीं दे पा रहे हैं?

अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में डॉक्टरी की प्रैक्टिस करने के लिए वहां की स्थानीय लाइसेंसिंग परीक्षाएं (जैसे USMLE या PLAB) पास करना जरूरी है. हाल ही में अंतरराष्ट्रीय नियमों में बदलाव हुआ है. इसके तहत केवल उन्हीं देशों के मेडिकल ग्रेजुएट्स ये परीक्षाएं दे सकते हैं, जिनके मेडिकल कॉलेज या नियामक संस्था को WFME से मान्यता प्राप्त हो. भारत में नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) इस प्रक्रिया को पूरा करने में लगा हुआ है, लेकिन कई तकनीकी और कागजी वजहों से इसमें देरी हो रही है.

मेडिकल स्टूडेंट्स के करियर पर क्या असर पड़ रहा है?

विदेश में मेडिकल लाइसेंसिंग परीक्षा देने के लिए स्टूडेंट्स कई साल पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं. इस तैयारी में भारी-भरकम फीस, कोचिंग का खर्च और समय लगता है.

  • समय की बर्बादी: परीक्षा में शामिल न हो पाने के कारण स्टूडेंट्स के कीमती साल बर्बाद हो रहे हैं.
  • वित्तीय नुकसान: कई छात्रों ने भारी कर्ज लेकर या अपनी जमापूंजी लगाकर परीक्षा की तैयारी और एप्लीकेशन फीस भरी थी, जो अब फंस गई है.
  • मानसिक तनाव: अनिश्चितता के माहौल में युवा डॉक्टरों का मनोबल गिर रहा है और उन्हें अपना करियर अंधकार में नजर आ रहा है.

क्या इसका कोई सॉल्यूशन मिलेगा?

मेडिकल क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि इस समस्या का समाधान सिर्फ और सिर्फ सरकार और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के स्तर पर ही संभव है. NMC को WFME के साथ मिलकर इस मान्यता प्रक्रिया (Accreditation) को जल्द से जल्द पूरा करना होगा. जब तक भारत की नियामक प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हरी झंडी नहीं मिल जाती, तब तक भारतीय छात्रों के लिए विदेशों में दाखिले और प्रैक्टिस के दरवाजे आंशिक रूप से बंद रहेंगे. छात्रों की मांग है कि सरकार इस मामले में तुरंत दखल दे.

About the Author

Deepali PorwalSenior Sub Editor

Deepali Porwal is a seasoned bilingual journalist with 11 years of experience in the media industry. She currently works with News18 Hindi, focusing on the Education and Career desk. She is kno…

और पढ़ें





Source link

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top