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Opinion: बंगाल का ‘शापित’ ट्रेंड, हारने वाली पार्टी हो जाती है नेस्तनाबूद!...


पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अनोखा पैटर्न दिखाई देता है. यहां सत्ता से विदा होने वाली पार्टियां कभी वापसी नहीं कर पातीं. एक बार जनादेश ने किसी को ठुकरा दिया तो वह लंबे समय तक विपक्ष की बेंच पर ही बैठी रहती है. कांग्रेस के बाद वामपंथी मोर्चा और अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ भी यही हो रहा है. 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत ने TMC की 15 साल की सत्ता का अंत कर दिया है. यह बदलाव बंगाल की राजनीति का नया अध्याय है, जहां क्षेत्रीय शक्तियां राष्ट्रीय लहर के सामने टिक नहीं पा रही हैं. यह पैटर्न सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि बंगाल की सामाजिक-आर्थिक संरचना, वोटर व्यवहार और संगठनात्मक कमजोरियों का नतीजा है. बंगाल में सत्ता परिवर्तन का संकेत पहले से ही मिलने लगता है. जब एक बार जनता का मूड पूरी तरह बदलता है, तो पुरानी पार्टी को समूल उखाड़ फेंका जाता है.

कांग्रेस 50 साल से कर रही इंतजार

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बंगाल की सबसे पुरानी और एक समय की सबसे मजबूत ताकत थी. स्वतंत्रता के बाद से 1977 तक कांग्रेस ने यहां लंबे समय तक राज किया. बिधान चंद्र रॉय जैसे दिग्गज मुख्यमंत्री रहे, लेकिन 1977 में वाम मोर्चा की लहर उठी तो कांग्रेस को करारी हार मिली. उसके बाद कांग्रेस लगभग 50 साल से सत्ता में वापसी का इंतजार कर रही है. 1972 में सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व में कांग्रेस की आखिरी मजबूत सरकार थी, लेकिन आपातकाल, नक्सलवाद और आर्थिक संकट ने कांग्रेस की छवि खराब कर दी. 1977 के बाद वामपंथियों ने लैंड रिफॉर्म और ग्रामीण संगठन के जरिए मजबूत पकड़ बना ली. कांग्रेस बंगाल में धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई. 2011 में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा को हराया. 2021 और 2026 के चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. कई बार वह अपना खाता तक नहीं खोल पाई. आज बंगाल में कांग्रेस तीसरे या चौथे नंबर की पार्टी बन कर रह गई है. उसके पारंपरिक वोटर- हिंदू मध्य वर्ग और कुछ अल्पसंख्यक- TMC और भाजपा के बीच बंट गए हैं. कांग्रेस की राष्ट्रीय छवि और बंगाल में संगठनात्मक ढांचे की कमी ने उसे वापसी नहीं करने दी. 50 साल का इंतजार अब शायद और लंबा हो गया है, क्योंकि नई पीढ़ी को कांग्रेस बंगाल में विकल्प के रूप में दिखाई ही नहीं देती.

34 साल बाद उखड़ा लेफ्ट का खूंटा

वाम मोर्चा ने 1977 से 2011 तक पूरे 34 साल बंगाल पर राज किया. ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे नेता इस युग के प्रतीक बने. लैंड रिफॉर्म, पंचायती राज और शिक्षा में कुछ उपलब्धियां रहीं, लेकिन अंतिम वर्षों में सिंगुर-नंदीग्राम जैसे आंदोलनों ने वाम सरकार को हिला दिया. औद्योगिक विकास की कमी, नौकरियों का अभाव और तुष्टिकरण की छवि ने जनता को नाराज कर दिया. 2011 में ममता बनर्जी की TMC ने भारी बहुमत से वाम मोर्चा को सत्ता से बेदखल कर दिया. उसके बाद वाम मोर्चा लगातार गिरावट पर है. 2016, 2021 और 2026 में भी वह खुद को मजबूत विपक्ष के रूप में भी स्थापित नहीं कर पाया. कई पारंपरिक वाम वोटर TMC की ओर गए, फिर कुछ भाजपा की ओर शिफ्ट हो गए. युवा पीढ़ी को वाम विचारधारा पुरानी और असफल लगने लगी है. 34 साल की सत्ता के बावजूद लेफ्ट आज बंगाल में मामूली ताकत बन कर रह गया है. संगठन टूटा, छात्र-युवा विंग कमजोर हुआ और वैचारिक आकर्षण खत्म हो गया. बंगाल में वाम की वापसी की कोई साफ संभावना नजर नहीं आती, क्योंकि न तो वे विकास का नया मॉडल पेश कर पाए और न ही विपक्षी एकता में अपनी भूमिका तय कर पाए.

TMC के जाने के मिल रहे थे संकेत

टीएमसी ने 2011 में सत्ता संभाली और ममता बनर्जी ने तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाला. शुरू के वर्षों में लोकप्रियता चरम पर थी. महिला सशक्तिकरण, कल्याणकारी योजनाएं और क्षेत्रीय गौरव के नारे ने उसे सशक्त बनाया, लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण, हिंसा और परिवारवाद की शिकायतें बढ़ीं. 2021 में भाजपा 38 प्रतिशत वोट शेयर और 77 सीटों तक पहुंच गई थी, जो टीएमसी की विदाई का संकेत था. 2026 के चुनावों में टीएमसी की हार के कई कारण थे. 15 साल के शासन से उपजा एंटी इनकम्बैंसी, कानून-व्यवस्था की समस्या, भर्ती घोटाले, और संगठनात्मक अंदरूनी कलह ने टीएमसी की ताकत क्षीण कर दी. भ्रष्टाचार और तोलाबाजी (रंगदारी) की संस्कृति ने टीेमसी की मुश्किलें बढ़ी. मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ कमजोर हुई और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में गया. उच्च मतदान प्रतिशत और मतदाता सूची संशोधन (SIR) जैसे मुद्दों ने भी खेल बिगाड़ा. ममता बनर्जी ने हार के बाद साजिश का आरोप लगाया, लेकिन जनादेश साफ था. टीएमसी की 15 साल की सत्ता समाप्त हो गई. TMC के जाने के संकेत 2021 से ही मिल रहे थे. स्थानीय चुनावों में हार, पंचायतों में हिंसा की खबरें और भाजपा का ग्रामीण विस्तार विदाई के संकेत थे. अब TMC विपक्ष में बैठ कर अपनी वापसी की रणनीति बना रही है, लेकिन इतिहास बताता है कि यह आसान नहीं होगा.

जाने वाले लौटते क्यों नहीं बंगाल में

आजादी के बाद से ही बंगाल में यह अनोखा ट्रेंड रहा है कि सत्ता गंवाने वाली पार्टियां कभी वापसी नहीं करतीं. इसके कई कारण हैं. पहला यह कि बंगाल में बदलाव अचानक नहीं होता. जनता पहले इसका संकेत देती है. फिर बदलाव का फाइनल फैसला कर लेती है. पुरानी पार्टी को काम करने का जनता भरपूर मौका देती है. इस दौरान जनता तंगी-तबाही और सरकार की मनमानी को भी झेल लेती है. समय आने पर वोटर अपनी लायल्टी बदल लेते हैं. कल जो टीएमसी के सपोर्टर थे, अब वे भाजपा के हो गए हैं या होते जा रहे हैं. इसी तरह लेफ्ट पार्टियों के लोग भी टीएमसी की ओर मुखातिब हो गए थे. यह भी कि युवा मतदाता पुरानी पार्टियों को पुराना और असफल मानते हैं. वे मुकाबले में खड़ी किसी नई पार्टी को सपोर्ट करते हैं. इन्हीं कारणों से कांग्रेस 50 साल और लेफ्ट 15 साल बाद भी वापस नहीं लौट पाए. टीएमसी के साथ भी यही चुनौती हो सकती है.

बीजेपी को अलग राह अपनानी होगी

भाजपा ने 2026 में पहली बार बंगाल में सरकार बनाई है. शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के नेतृत्व में यह ऐतिहासिक जीत है. लेकिन अब चुनौती सत्ता संभालने की है. बंगाल की अनोखी संस्कृति, भाषाई गौरव और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखना होगा. भाजपा को विकास, रोजगार, उद्योग और कानून-व्यवस्था पर फोकस करना चाहिए. टीएमसी की गलतियों को दोहराने से बचना होगा. हिंदुत्व के साथ बंगाली अस्मिता को जोड़ना, अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतना और आर्थिक सुधार जरूरी हैं. शुभेंदु ने सीएम बनते ही इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है. अगर भाजपा लंबे समय तक टिकना चाहती है तो उसे क्षेत्रीय संवेदनशीलताओं का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय एजेंडे को लोकल बनाना होगा. बंगाल की राजनीति में सत्ता का चक्र तेजी से घूमता है, लेकिन वापसी मुश्किल होती है. कांग्रेस और वाम दल इसके उदाहरण हैं. टीएमसी अब इसी राह पर है. भाजपा के लिए यह मौका है, लेकिन सावधानी भी जरूरी है. बंगाल को अगर विकास की राह पर लाना है तो पुरानी गलतियों से सबको सबक लेना होगा.



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