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अमेरिका से मिला धोखा तो चट्टान की तरह भारत संग खड़ा हुआ...


India-France Relations: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 12 साल के कार्यकाल में 7वीं बार फ्रांस दौरे पर हैं. इससे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने 10 साल के कार्यकाल में चार बार पेरिस का दौरा किया. उनसे पहले अटल बिहार वाजपेयी बतौर प्रधानमंत्री अपने करीब छह साल के कार्यकाल में दो बार फ्रांस गए. इस बीच वर्ष 2000 से अब तक नौ बार फ्रांसीसी राष्ट्रपतियों ने भारत का आधिकारिक दौरा किया. इसमें मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 2018 से अब तक चार बार भारत का दौरा कर चुके हैं. दोनों देशों के बीच ये उच्च स्तरीय दौरे यूं नहीं हुए हैं. दोनों के बीच भरोसा बनाने में दशकों का समय लगा है. तब जाकर भारत और फ्रांस इस मोड़ पर पहुंचे हैं. दोनों देशों के बीच रिश्तों को इस मोड़ पर पहुंचाने में एक सबसे अहम भूमिका 1998 की घटना की रही जब अमेरिका, कनाडा, जापान सहित तमाम बड़े यूरोपीय देशों ने भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगा दिए लेकिन फ्रांस एक सच्चे मित्र की तरह सीना तानकर नई दिल्ली के साथ खड़ा रहा. इस परीक्षा में तपकर भारत और फ्रांस की दोस्ती अटूट बन गई.

दरअसल, मई 1998 का समय था. राजस्थान के पोखरण का तपता रेगिस्तान. धरती के नीचे कुछ ऐसा हुआ जिसने दुनिया की भू-राजनीति को झकझोर दिया. भारत ने पांच परमाणु परीक्षण कर खुद को खुले तौर पर परमाणु शक्ति घोषित कर दिया. नई दिल्ली में इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वाभिमान का क्षण माना गया, लेकिन वाशिंगटन, टोक्यो और कई पश्चिमी राजधानियों में इसे चुनौती के रूप में देखा गया. उस वक्त देश की बागडोर अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों में थी.

कुछ ही दिनों में अमेरिका ने प्रतिबंधों की झड़ी लगा दी. आर्थिक सहायता रोकने से लेकर तकनीकी सहयोग सीमित करने तक कई कदम उठाए गए. जापान, कनाडा और कुछ अन्य देशों ने भी भारत से दूरी बनानी शुरू कर दी. ऐसा लग रहा था कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेला पड़ जाएगा. लेकिन, इसी कठिन दौर में यूरोप से एक ऐसी आवाज उठी जिसने भारत को यह एहसास कराया कि सभी पश्चिमी देश एक जैसी सोच नहीं रखते. वह आवाज फ्रांस की थी.

जब दुनिया सजा देने पर उतारू थी

पोखरण-2 के बाद अधिकांश पश्चिमी देशों का तर्क था कि भारत को उसके फैसले की कीमत चुकानी चाहिए. भारत पर वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था को चुनौती देने के आरोप लगाए जा रहे थे. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की जा रही थी. तभी फ्रांस भारत के साथ खड़ा हो गया. तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति जैक्स शिराक ने साफ संकेत दिया कि भारत को अलग-थलग करना समाधान नहीं है. पेरिस का मानना था कि भारत की सुरक्षा चिंताओं को समझे बिना केवल प्रतिबंध की भाषा बोलना व्यावहारिक नहीं होगा. फ्रांस ने यह भी महसूस किया कि दक्षिण एशिया की जटिल सुरक्षा परिस्थितियों को यूरोप के नजरिए से नहीं समझा जा सकता. यह वह समय था जब भारत का एक पड़ोसी पाकिस्तान परमाणु चाहत रखता था और दूसरी ओर पहले से परमाणु शक्ति बन चुका चीन था.

वर्ष 2013 में नई दिल्ली राष्ट्रपति फ्रांस्क्वा ओलांद के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह. फोटो- रायटर

भारत के खिलाफ गोलबंदी

वर्ष 1998 में भारत के परमाणु परीक्ष के बाद ब्रिटेन के बर्मिंघम में जी-8 शिखर सम्मेलन आयोजित हुई. उस बैठक में भारत के खिलाफ कड़े सामूहिक रुख की चर्चा हुई. अमेरिका और उसके कुछ सहयोगी देश नई दिल्ली पर दबाव बढ़ाना चाहते थे. यह जी-8 आज का जी-7 है. उस वक्त उस समूह में रूस भी शामिल था. इस कारण उसका नाम जी-8 था. अब इस समूह में रूस नहीं है. इसलिए इसका नाम जी-7 कर दिया गया.

फ्रांस और रूस बने संकटमोचक

कूटनीतिक गलियारों में यह संदेश साफ था कि भारत को पूरी तरह खलनायक बना दिया जाए. लेकिन, रूस और फ्रांस संकटमोचक बनकर उभरे. फ्रांस का मानना था कि संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए. यही वह क्षण था जब नई दिल्ली ने पहली बार महसूस किया कि पेरिस सिर्फ एक साझेदार नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में साथ खड़ा रहने वाला मित्र भी हो सकता है. फिर दोनों देशों के रिश्ते में एक भरोसे की बहाली हुई. यह भरोसा समय के साथ रणनीतिक साझेदारी तक पहुंच गया.

अटल और शिराक की नई शुरुआत

पोखरण परीक्षणों के कुछ ही महीनों बाद सितंबर 1998 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी फ्रांस पहुंचे. यह यात्रा केवल एक औपचारिक राजनयिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई. इसी यात्रा के दौरान भारत और फ्रांस ने औपचारिक रूप से ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ की शुरुआत की. यह किसी पश्चिमी देश के साथ भारत की पहली रणनीतिक साझेदारी थी. आज जब भारत की रणनीतिक साझेदारियों की लंबी सूची दिखाई देती है, तो यह याद रखना जरूरी है कि इसकी शुरुआत फ्रांस के साथ हुई थी.

पीएम मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों. फोटो- रायटर

राजनीति और कूटनीति में दोस्ती अक्सर परिस्थितियों के साथ बदल जाती है. लेकिन भारत-फ्रांस संबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि 1998 में बना भरोसा आने वाले वर्षों में लगातार मजबूत होता गया. फ्रांस उन शुरुआती देशों में शामिल रहा जिसने भारत के साथ परमाणु मुद्दों पर उच्च स्तरीय संवाद शुरू किया. बाद में जब भारत को वैश्विक परमाणु व्यवस्था में स्वीकार्यता मिलने लगी, तब उसी विश्वास ने नई संभावनाओं के दरवाजे खोले. 2008 में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) से छूट मिलने के बाद भारत के साथ असैन्य परमाणु समझौता करने वाला पहला देश भी फ्रांस ही बना. यह कोई संयोग नहीं था. इसकी नींव एक दशक पहले उस दौर में रखी जा चुकी थी जब भारत पर प्रतिबंधों का साया था.

आज भी क्यों याद की जाती है 1998 की कहानी?

आज भारत और फ्रांस रक्षा, अंतरिक्ष, समुद्री सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे अनेक क्षेत्रों में साथ काम कर रहे हैं. राफेल लड़ाकू विमान से लेकर हिंद महासागर में सहयोग तक दोनों देशों के रिश्ते लगातार गहरे हुए हैं. लेकिन, इन संबंधों की असली ताकत किसी रक्षा सौदे या संयुक्त बयान में नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक स्मृति में छिपी है जब भारत कठिन दौर से गुजर रहा था और दुनिया का एक प्रभावशाली देश उसके साथ खड़ा दिखाई दिया. 1998 की कहानी केवल परमाणु परीक्षणों की कहानी नहीं है. यह भरोसे, रणनीतिक दूर दृष्टि और कठिन समय में निभाई गई दोस्ती की कहानी है. शायद यही वजह है कि नई दिल्ली और पेरिस के रिश्तों की चर्चा जब भी होती है, तो पोखरण के बाद का वह दौर जरूर याद आ जाता है.



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