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El Nino Monsoon Impact: प्रशांत महासागर में अल नीनो सक्रिय हो चुका है. इसे मानसून का हत्यारा भी माना जाता है. इसके एक्टिव होने का सीधा असर मानसून पर पड़ता है, जिसकी वजह से भारत में बारिश में कमी आती है. औसत से कम बारिश होने की वजह से खेतीबारी की गतिविधियां बुरी तरह से प्रभावित होती हैं, जिससे इकोनॉमी भी प्रभावित होती है.
IMD के डायरेक्टर जनरल मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि अल नीनो से घबराने की जरूरत नहीं है. अल नीनो से कम बारिश होने की आशंका है. इसका असर खेतीबारी पर पड़ना तय माना जा रहा है. (फाइल फोटो/Reuters)
रिपोर्ट: सुरोजीत गुप्ता
IMD चीफ डॉ. महापात्र ने कहा कि जुलाई, अगस्त और सितंबर की शुरुआत तक देश में मध्यम स्तर की अल नीनो परिस्थितियां रहने की संभावना है. इसके बाद इसकी तीव्रता बढ़ सकती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि मौसम विभाग लगातार स्थिति पर नजर रख रहा है और समय रहते चेतावनी एवं आवश्यक सलाह जारी की जाएगी. अल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के सतही जल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है. इसका असर वैश्विक तापमान और वर्षा के पैटर्न पर पड़ता है. भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मानसून पर इसकी सीधी या अप्रत्यक्ष छाप पड़ सकती है. मानसून देश की कृषि, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा माना जाता है.
अल नीनो से निपटने की तैयारी
IMD प्रमुख के अनुसार, सरकार पहले ही संभावित जोखिम को देखते हुए राज्यों और जिलों में विशेष निगरानी के निर्देश दे चुकी है. जिन क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका है, वहां त्वरित कार्रवाई की योजना तैयार की जा रही है. कृषि क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए बीजों की उपलब्धता, जल प्रबंधन और वैकल्पिक फसल योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी किसानों से घबराने की बजाय समय रहते तैयारी करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि देश के प्रमुख जलाशयों में इस समय जल स्तर सामान्य से बेहतर स्थिति में है, जिससे खरीफ फसलों को सहारा मिलेगा और संभावित सूखे जैसी परिस्थितियों का प्रभाव कुछ हद तक कम किया जा सकेगा.
मानसून कमजोर हुआ तो क्या पड़ेगा असर
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है और वर्षा में कमी आती है, तो इसका असर कृषि उत्पादन और देश की आर्थिक वृद्धि दर पर पड़ सकता है. विशेष रूप से तिलहन, दलहन, खाद्य तेल और कपास जैसी अपेक्षाकृत कम सिंचित फसलें अधिक प्रभावित हो सकती हैं. इससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका भी पैदा हो सकती है. डॉ. महापात्र ने बताया कि उत्तर-पश्चिम भारत, मध्य भारत और प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है. गुजरात, राजस्थान से लेकर ओडिशा, उत्तरी आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक के कुछ क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं अपेक्षाकृत सीमित हैं. ऐसे इलाकों में यदि वर्षा कम रहती है तो उसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है.
वेदर फोरकास्ट सिस्टम में सुधार
आईएमडी ने मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में हुई प्रगति पर महापात्र ने बताया कि 2021 से 2025 के बीच दीर्घकालिक मानसून पूर्वानुमान में त्रुटि घटकर केवल 2.2 प्रतिशत रह गई है, जबकि 2016 से 2020 के दौरान यह 7.5 प्रतिशत थी. नई तकनीक और आधुनिक पद्धतियों के कारण न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के लिए भी मौसम पूर्वानुमान की सटीकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो की चुनौती को देखते हुए सतर्कता, वैज्ञानिक तैयारी और समय पर कार्रवाई ही इसके संभावित प्रभावों को कम करने की सबसे प्रभावी रणनीति होगी.