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आस्था का केंद्र बना श्री काकाजी तीर्थ, जहां विराजते हैं विश्व के...


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Shri Kakaji Tirth: श्री काकाजी तीर्थ लगभग 500 वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. इस पवित्र तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता यहां विराजमान स्वयंभू पार्श्वनाथ भगवान की अद्वितीय प्रतिमा है, जिसे विश्व में पहली बार डबल फण वाले स्वरूप के रूप में देखा जाता है. यही कारण है कि यह तीर्थ जैन धर्मावलंबियों के साथ-साथ अन्य श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. मंदिर की प्राचीनता, धार्मिक महत्व और आध्यात्मिक वातावरण यहां आने वाले भक्तों को गहरी शांति और श्रद्धा का अनुभव कराते हैं. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करती है. देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु इस अनूठे दर्शन के लिए पहुंचते हैं. श्री काकाजी तीर्थ केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक भी है.

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जोधपुर: जोधपुर जिले के कापरड़ा गांव में स्थित श्री जैन श्वेताम्बर प्राचीन तीर्थ श्री काकाजी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करीब 500 वर्षों के इतिहास, आस्था और चमत्कारों का जीवंत प्रतीक है. मान्यता है कि यहां विराजमान स्वयंभू पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा वर्ष 1617 के आसपास बबूल के घने जंगल के बीच धरती से प्रकट हुई थी. इसके बाद जैतारण के हाकिम भानाजी भंडारी ने यति महाराज के आशीर्वाद से इस भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया और 1621 ईस्वी में मंदिर की प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई. चार मंजिला इस अद्भुत मंदिर की ऊंचाई 95 फीट है, जहां चारों दिशाओं में चौमुखजी की प्रतिमाएं स्थापित हैं.

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता भगवान पार्श्वनाथ की विश्वविख्यात डबल फण वाली स्वयंभू प्रतिमा है, जिसे दुनिया में अपनी तरह की पहली प्रतिमा माना जाता है. नक्काशीदार खंभे, संगमरमर की जालियां, कमलाकार छतें और सदियों पुरानी परंपराएं इस तीर्थ को राजस्थान के प्रमुख जैन धार्मिक स्थलों में विशेष पहचान दिलाती हैं.

500 वर्ष पुराना आस्था का अद्भुत तीर्थ
श्री जैन श्वेताम्बर प्राचीन तीर्थ श्री काकाजी कापरड़ा का इतिहास लगभग 500 वर्ष पुराना बताया जाता है. मंदिर के सेवायत मूलचंद दाधीच के अनुसार उनके परिवार को इस तीर्थ की सेवा करते हुए करीब 90 वर्ष हो चुके हैं. मान्यता है कि जैतारण के तत्कालीन हाकिम भाना जी भंडारी ने यति महाराज के आशीर्वाद से मात्र 500 मुद्रा में इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था. समय के साथ यह तीर्थ जैन समाज ही नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया.

डबल फण वाली स्वयंभू प्रतिमा की अनोखी महिमा
इस तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता भगवान पार्श्वनाथ की स्वयंभू प्रतिमा है। बताया जाता है कि यह प्रतिमा धरती से स्वयं प्रकट हुई थी और इसी कारण इसे स्वयंभू पार्श्वनाथ के नाम से जाना जाता है। प्रतिमा पर नाग-नागिन के डबल फण बने हुए हैं, जो पूरे विश्व में अपनी तरह की पहली प्रतिमा मानी जाती है। भगवान के हाथों में नाखून, हस्तरेखाएं और चरणों में पद्म रेखा जैसी आकृतियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। जैन धर्म में भगवान पार्श्वनाथ के 108 प्रमुख तीर्थों में इस तीर्थ का भी विशेष स्थान माना जाता है.

95 फीट ऊंचाई और 114 खंभों पर खड़ा भव्य मंदिर
यह भव्य मंदिर जमीन से लगभग 95 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और अपनी स्थापत्य कला के लिए विशेष पहचान रखता है. मंदिर का निर्माण 114 मजबूत खंभों के आधार पर किया गया है. परिसर में चारों दिशाओं में भगवान की प्रतिमाओं से युक्त चौमुखा मंदिर भी स्थापित है, जो श्रद्धालुओं को विशेष आकर्षित करता है. प्राचीन शिल्पकला और धार्मिक महत्व का अद्भुत संगम इस तीर्थ को राजस्थान के प्रमुख जैन धार्मिक स्थलों में शामिल करता है.

प्रतिष्ठाओं और चमत्कारी भैरूजी की गौरवशाली परंपरा
मंदिर की पहली प्रतिष्ठा संवत् 1678 की वैशाख सुदी पूर्णिमा को आचार्य जिनचंद्र सूरीश्वरजी महाराज के सान्निध्य में सम्पन्न हुई थी. इसके बाद लगभग 107 वर्ष पूर्व आचार्य नेमिसूरीश्वरजी महाराज ने दूसरी प्रतिष्ठा करवाई. वहीं करीब 11 वर्ष पहले आचार्य सोमचंद सूरीश्वरजी महाराज के मार्गदर्शन में मंदिर का जीर्णोद्धार कर तीसरी प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई. मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर विराजमान अधिष्ठायक देव भैरूजी की प्रतिमा भी लगभग 500 वर्ष पुरानी मानी जाती है, जिसकी प्रतिष्ठा यति महाराज द्वारा की गई थी. श्रद्धालु इसे अत्यंत चमत्कारी मानते हैं और दूर-दूर से दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं.

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Jagriti Dubey

Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें



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