सिद्धारमैया इस्तीफा दे दिए, लेकिन अपने कार्यकाल के अंतिम क्षणों में वे एक ऐसा पासा फेंक गए हैं, जिसने कर्नाटक की सियासत को हमेशा के लिए बदल दिया है. पद छोड़ने से ठीक पहले सिद्धारमैया ने कर्नाटक की जाति जनगणना वाला सर्वे स्वीकर कर लिया था, जो बताता है कि अहिंदा-लिंगायत की संख्या और उनकी भागीदारी कितनी है. खुद अहिंदा समुदाय से आने वाले सिद्धा ने इस कार्ड से ऐसा दांव चला है, जिससे निपटना डीके शिवकुमार के लिए आसान नहीं होगा.
कर्नाटक के समाज के लिए ‘सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण रिपोर्ट’का मंजूर होना एक बहुत बड़ा मोड़ है. माना जा रहा है कि इस सर्वे के आंकड़े राज्य की आबादी और ताकत के पुराने समीकरणों को पूरी तरह बदल देंगे. इसके आने से राजनीति में हिस्सेदारी, चुनाव के टिकटों और आरक्षण की व्यवस्था में बहुत बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. इस सर्वे को सरकारी मुहर देकर सिद्धारमैया ने न केवल पिछड़ों, दलितों और गरीबों के मसीहा के रूप में अपनी साख को मजबूत कर लिया है, बल्कि उन्होंने एक ऐसी लकीर खींच दी है, जिसे उनका कोई भी उत्तराधिकारी चाहकर भी आसानी से मिटा नहीं पाएगा.
हमेशा से लिंगायत और वोक्कालिगा का दबदबा
इस जाति सर्वे के आंकड़ों का सबसे पहला और सीधा असर कर्नाटक के सरकारी और प्रशासनिक कामकाज पर पड़ेगा. इतिहास गवाह है कि कर्नाटक की सत्ता और राजनीति पर हमेशा से लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे दो रसूखदार और मजबूत किसान समुदायों का कब्जा रहा है. इन दोनों जातियों ने अपनी बड़ी आबादी के भरोसे राज्य की राजनीति पर हमेशा अपना दबदबा बनाए रखा. लेकिन, अगर इस नए सरकारी सर्वे के आंकड़े यह साबित कर देते हैं कि ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यकों की असली आबादी पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा है, तो हक की एक नई जंग शुरू हो जाएगी.
कैसे पलटेगा खेल
आबादी का यह नया गणित सामने आने के बाद सरकारी नौकरियों, पढ़ाई की सीटों और सरकारी योजनाओं के फायदे में अपनी-अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग तेज होगी. इस आने वाली चुनौती ने सरकार के सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है. इस सर्वे की सिफारिशों को लागू करने की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम बड़े और रसूखदार समाजों को नाराज कर देगा, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनका बरसों पुराना दबदबा कम हो जाएगा. इस तरह यह सर्वे एक ऐसा सियासी हथियार बन गया है, जो भविष्य की हर सरकारी चर्चा को सामाजिक न्याय और बराबरी पर लाने के लिए मजबूर करेगा.
लागू करने में देरी करेगी नाराज
अगर दूसरी तरफ से देखें, तो इस रिपोर्ट को लागू करने में जरा सी भी देरी कांग्रेस के उस अहिंदा वोटर को नाराज कर सकती है, जिसे सिद्धारमैया ने अपनी जिंदगी के कई साल लगाकर एकजुट किया है. बड़े स्तर पर देखा जाए, तो सिद्धारमैया का यह आखिरी कदम कांग्रेस पार्टी की उस राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत राहुल गांधी देश भर में जाति जनगणना कराने की बात कह रहे हैं. कर्नाटक में इस वादे को सच करके मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी को पूरे देश के सामने दिखाने के लिए एक मॉडल दे दिया है, जिससे कांग्रेस यह कह सके कि सामाजिक न्याय को लेकर उसका वादा सिर्फ चुनावी भाषण नहीं था.
वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं शिवकुमार
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ यह है कि सिद्धारमैया तो यह दांव खेलकर जा रहे हैं, पर इस सुलगते हुए मुद्दे को संभालने का पूरा जिम्मा अब नए नेता यानी डीके शिवकुमार के कंधों पर आ गया है. खुद वोक्कालिगा समुदाय के एक बड़े और मजबूत नेता होने के कारण शिवकुमार के लिए यह स्थिति ‘कांटों का ताज’ जैसी है. याद रहे कि वोक्कालिगा और लिंगायत समाज के कई बड़े नेताओं ने पहले इस सर्वे के तौर-तरीकों और इसकी सच्चाई पर गंभीर सवाल उठाए थे. ऐसे में अपनी ही जाति के विरोध और पार्टी की नीति के बीच शिवकुमार एक बड़ी दुविधा में फंस गए हैं.
कैबिनेट संभालना पहली परीक्षा
डीके शिवकुमार के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि वे इस मुद्दे पर बंटने वाली अपनी कैबिनेट और सरकार को कैसे संभालते हैं. उन्हें एक तरफ अपनी साख बचाने के लिए वोक्कालिगा और लिंगायत जैसे मजबूत समाजों के गुस्से को शांत करना होगा, तो दूसरी तरफ कांग्रेस आलाकमान के एजेंडे और पिछड़ों-दलितों की उम्मीदों को भी पूरा करना होगा. सिद्धारमैया ने कुर्सी छोड़ने से ठीक पहले इस रिपोर्ट को स्वीकार करके अपने विरोधियों और आने वाली सरकार के हाथ बांध दिए हैं. अब नई सरकार को उसी दायरे में रहकर काम करना होगा, जो सिद्धारमैया तय कर गए हैं.