देहरादून में गर्मियों के मौसम में हजारों पर्यटक ठंडी आबोहवा का आनंद लेने पहुंचते हैं. ब्रिटिश काल से ही देहरादून गर्मियों की छुट्टियां बिताने और आराम करने का प्रमुख केंद्र रहा है. यहां केवल अंग्रेज ही नहीं, बल्कि उनके घोड़े भी गर्मियों में आराम के लिए लाए जाते थे. उस समय दिल्ली में भीषण गर्मी पड़ती थी, इसलिए देहरादून के राजपुर रोड पर ब्रिटिश गवर्नर-जनरल के अंगरक्षक दल के घोड़ों के लिए ग्रीष्मकालीन शिविर स्थापित किया गया था, जहां वे गर्मियों के दौरान रहते थे.
साल 1838 में किया गया था तैयार
साल 1838 में तैयार किया गया यह अस्तबल आज भी मौजूद है, जिसे अब राष्ट्रपति निकेतन के नाम से जाना जाता है. यहां देश के राष्ट्रपति जब भी देहरादून आते हैं, ठहरते हैं. यहां उनके चित्र और ऐतिहासिक वस्तुएं भी सुरक्षित रखी गई हैं. यदि आप गर्मियों में अपने परिवार के साथ बगीचों की सैर करना चाहते हैं या शहर की गर्मी से दूर ठंडी हवाओं में सुकून के पल बिताना चाहते हैं, तो राष्ट्रपति निकेतन एक बेहतर विकल्प है.
राष्ट्रपति निकेतन के नाम से है मशहूर
राष्ट्रपति निकेतन को राष्ट्रपति का विश्रामगृह भी कहा जाता है, क्योंकि यहां राष्ट्रपति ठहरते हैं. आजादी के बाद लगभग हर राष्ट्रपति यहां ठहर चुका है, हालांकि जानकारी के अनुसार डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम यहां नहीं ठहरे थे. देहरादून निवासी डॉ. संजीव शर्मा, जो पिछले 48 वर्षों से यहां रह रहे हैं, बताते हैं कि पहले उन्हें इस स्थान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. वे केवल इतना जानते थे कि यहां राष्ट्रपति ठहरते हैं. पहले यह स्थान आम लोगों के लिए खुला नहीं था, इसलिए लोग इसे देख नहीं पाते थे, लेकिन अब इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया है.
अब लोग अपने परिवार के साथ यहां घूमने आते हैं और स्कूलों के बच्चों को भी शैक्षिक भ्रमण के लिए लाया जाता है. डॉ. शर्मा के अनुसार, यह वास्तव में एक विश्व धरोहर जैसा स्थल है, जिसे बहुत अच्छे से संरक्षित किया गया है.
राष्ट्रपति निकेतन परिसर में केवल बगीचे और पेड़-पौधे ही नहीं हैं, बल्कि एक संग्रहालय भी बनाया गया है. इस संग्रहालय में अब तक के सभी राष्ट्रपतियों की तस्वीरें और उनसे जुड़ी वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं. यहां पुराना फर्नीचर, रेडियो, टेलीफोन और एक बड़ा भाला भी रखा गया है, जिसका उपयोग राष्ट्रपति के अंगरक्षक किया करते थे.
यहां बहुत कुछ है खास
पर्यटकों को उत्तराखंड की संस्कृति से परिचित कराने के लिए यहां कई कलाकृतियां और हस्तशिल्प भी प्रदर्शित किए गए हैं, ताकि स्थानीय कारीगरों की कला को भी पहचान मिल सके. बताया जाता है कि 1920 के दशक में यहां घुड़साल बनाई गई थी, जिसे बाद में इकाई के कमांडेंट के निवास के रूप में स्थापित किया गया.
भारत में राष्ट्रपति के तीन विश्राम स्थल हैं, जिनमें देहरादून के अलावा हैदराबाद और शिमला शामिल हैं. ब्रिटिश काल में, लगभग 1938 के आसपास, दिल्ली की गर्मी से बचाने के लिए ब्रिटिश गवर्नर-जनरल के अंगरक्षकों के घोड़ों को यहां के अस्तबल में रखा जाता था. यह ऐतिहासिक अस्तबल आज भी यहां मौजूद है. इस जगर को पिछले वर्ष ही आम जनता के लिए खोला गया है. यहां एट्री फीस प्रति व्यक्ति 50 रुपये का टिकट निर्धारित किया गया है.