मध्य प्रदेश में इन दिनों आदिवासी समुदायों ने 44605 करोड़ रुपए के केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के खिलाफ़ ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन किया है. उन्हें विस्थापन का डर है, मुआवज़े की लिस्ट में गड़बड़ियां हैं और पुनर्वास पैकेज भी अपर्याप्त हैं. प्रदर्शनकारियों ने ‘चिता आंदोलन’ (अंतिम संस्कार की चिता बनाकर विरोध) और फांसी के फंदे जैसे अनोखे तरीके अपनाए, जिसके बाद जुलाई 2026 में पुलिस ने प्रदर्शन स्थल को खाली करा दिया. हज़ारों आदिवासी परिवारों ने नदी-लिंक परियोजना के खिलाफ़ ‘चिता आंदोलन’ क्यों शुरू किया. भारत में सिर्फ केन-बेतवा ही नहीं, कई अन्य नदियों को लेकर विवाद है और समय-समय इसे लेकर विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं. हम आपको केन-बेतवा लिंक परियोजना विवाद के साथ-साथ भारत के बड़े नदी विवाद के बारे में बताने जा रहे हैं. इसे लेकर क्या कानून है और इसे कैसे सुलझाया जा सकता है? आइए जानते हैं.
केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना से छतरपुर और पन्ना ज़िलों के 7000 से ज़्यादा परिवारों के घर और ज़मीन पानी में डूबने और विस्थापन का खतरा है. प्रदर्शनकारी, सरकार से पुनर्वास पैकेज को ₹12.5 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख प्रति परिवार करने और हर घर के एक व्यक्ति को अलग लाभार्थी मानने की मांग कर रहे हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि असली निवासियों को मुआवज़े की लिस्ट से बाहर रखा गया, जबकि जो वहां के निवासी नहीं थे, उन्हें गलती से शामिल कर लिया गया.
कुपी गांव में एक्टिविस्ट अमित भटनागर के लीडरशिप में ग्रामीणों ने ‘जल सत्याग्रह’ और ‘चिता आंदोलन’ (नकली चिता बनाकर विरोध) कर रहे थे. अमित 14 दिनों से भूख हड़ताल पर थे. 19 जुलाई 2026 को मध्य प्रदेश पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और प्रदर्शन स्थल को खाली करा दिया. जबकि अमित भटनागर को अस्पताल में भर्ती कराया गया. गतिरोध के बाद, प्रशासन ने ज़मीनी स्तर पर नए सिरे से जांच करने के लिए सहमति जताई, तो अमित भटनागर ने 23 जुलाई 2026 को अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी.
केन-बेतवा लिंक परियोजना विवाद
इस प्रदर्शन की वजह से केन-बेतवा नदी लिंक प्रोजेक्ट एक बार फिर चर्चा में है. हालांकि यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी कावेरी, कृष्णा, रावी-ब्यास और महानदी जैसी नदियों को लेकर राज्यों के बीच लंबे समय तक विवाद चलता रहा है. केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना मानी जाती है. इसका उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के अतिरिक्त जल को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी तक पहुंचाना है ताकि बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की समस्या कम हो सके. हालांकि इस परियोजना का विरोध भी लगातार होता रहा है. पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा, जबकि कई स्थानीय ग्रामीणों और किसानों ने भूमि अधिग्रहण तथा विस्थापन को लेकर विरोध प्रदर्शन किए.
कावेरी नदी विवाद
दक्षिण भारत का सबसे चर्चित नदी विवाद कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर है. इसमें केरल और पुडुचेरी भी पक्षकार हैं. यह विवाद ब्रिटिश काल के समझौतों से जुड़ा है, लेकिन आजादी के बाद पानी की मांग बढ़ने के साथ यह और गंभीर हो गया. कई बार सुप्रीम कोर्ट और कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण को हस्तक्षेप करना पड़ा. जब भी कम बारिश होती है और कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का निर्देश मिलता है, तब दोनों राज्यों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं. कई बार हिंसा, बंद और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने की घटनाएं भी सामने आई हैं.
कृष्णा नदी विवाद
महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच कृष्णा नदी के जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद है. 2014 में तेलंगाना राज्य बनने के बाद यह विवाद और बढ़ गया. दोनों राज्यों ने कई सिंचाई परियोजनाओं पर अपने अधिकार का दावा किया. इस मामले में कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया, जिसने संबंधित राज्यों के लिए जल आवंटन निर्धारित किया. आज भी कई परियोजनाओं और जलाशयों से पानी छोड़ने को लेकर समय-समय पर मतभेद सामने आते रहते हैं.
रावी-ब्यास नदी विवाद
उत्तर भारत में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच रावी और ब्यास नदियों के पानी को लेकर दशकों पुराना विवाद है. इस विवाद का सबसे बड़ा केंद्र सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर रही है. हरियाणा लंबे समय से अपने हिस्से का पानी और नहर निर्माण पूरा करने की मांग करता रहा है, जबकि पंजाब का कहना है कि उसके पास अतिरिक्त पानी उपलब्ध नहीं है. इस मुद्दे पर कई बार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है. राजनीतिक दलों ने भी इसे चुनावी मुद्दा बनाया और कई बार बड़े आंदोलन हुए.
महानदी विवाद
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी के पानी को लेकर विवाद पिछले एक दशक में काफी बढ़ा है. ओडिशा का आरोप है कि छत्तीसगढ़ द्वारा ऊपरी हिस्से में बनाए जा रहे बांध और बैराजों के कारण उसके हिस्से में पानी कम पहुंच रहा है. वहीं छत्तीसगढ़ का कहना है कि वह अपने वैध अधिकारों के तहत जल संसाधनों का उपयोग कर रहा है. इस विवाद को लेकर ओडिशा में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए. कई सामाजिक संगठनों ने जल सत्याग्रहआयोजित किए. वहीं कुछ स्थानों पर लोगों ने ‘चिता आंदोलन’ भी किया, जिसमें सांकेतिक रूप से चिता सजाकर सरकारों के खिलाफ विरोध दर्ज कराया गया. मामला अंततः महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण तक पहुंचा.
ऐसे विवाद क्यों होते हैं?
भारत में अधिकांश बड़ी नदियां एक से अधिक राज्यों से होकर गुजरती हैं. बढ़ती आबादी, सिंचाई की जरूरत, औद्योगिक विकास, जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून के कारण पानी की उपलब्धता पर दबाव लगातार बढ़ रहा है. जब कोई राज्य अपने यहां बांध, बैराज या सिंचाई परियोजना बनाता है, तो निचले हिस्से वाले राज्य को आशंका होती है कि उसके हिस्से का पानी कम हो जाएगा. यही स्थिति विवाद को जन्म देती है.
संविधान और कानून क्या कहते हैं?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत संसद को अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया है. इसी आधार पर अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 बनाया गया, जिसके तहत विभिन्न नदी जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किए जाते हैं. इसके अलावा कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और राज्यों को न्यायाधिकरण या अदालत के आदेशों का पालन करना होता है.
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि नदी जल विवादों का स्थायी समाधान केवल अदालतों से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जल प्रबंधन, पारदर्शी डेटा शेयर करने, जल संरक्षण और राज्यों के बीच सहयोग से संभव है. आधुनिक तकनीक, वास्तविक समय के जल प्रवाह के आंकड़े और जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए नई जल नीति तैयार करने की भी जरूरत है.