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झारखंड हाईकोर्ट ने किराये की संपत्ति से जुड़े बेदखली विवादों की सुनवाई के बाद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद कहा है कि किराये की संपत्ति से जुड़े बेदखली विवादों की सुनवाई केवल इस आधार पर कॉमर्शियल कोर्ट में नहीं हो सकती कि संपत्ति का उपयोग वाणिज्यकर गतिविधियों के लिए हो रहा है। अदालत ने कहा कि यदि किसी विशेष किराया नियंत्रण कानून के तहत बेदखली मामलों की सुनवाई का अधिकार रेंट कंट्रोलर को दिया गया है, तो कमर्शियल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र स्वतः समाप्त हो जाता है। यह मामला देवानंद सिंह एंड सन एचयूएफ द्वारा वर्ष 2023 में धनबाद के रेंट कंट्रोलर-सह-एसडीओ के समक्ष दाखिल बेदखली से जुड़ा था। इस मामले में आदित्य बिड़ला लाइफस्टाइल ब्रांड्स लिमिटेड के खिलाफ कार्यवाही शुरू की गई थी। कंपनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि विवादित परिसर पूरी तरह व्यावसायिक उपयोग में है। इसलिए यह कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट-2015 के तहत व्यवसायिक विवाद का है, जिसकी सुनवाई केवल कमर्शियल कोर्ट में होनी चाहिए। कंपनी ने यह भी कहा कि वह अब परिसर के कब्जे में नहीं है और फ्रेंचाइजी समझौता समाप्त होने के बावजूद उसकी फ्रेंचाइजी वहां बना हुई है। इसलिए रेंट कंट्रोलर को मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। कंपनी का वास्तविक कब्जा है या नहीं, इसका निर्णय रेंट कंट्रोलर करेगा अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि झारखंड बिल्डिंग (लीज, रेंट एंड एविक्शन) कंट्रोल एक्ट, 2011 ने बेदखली मामलों का अधिकार रेंट कंट्रोलर को सौंपा है। भले ही अधिनियम में सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर स्पष्ट रोक नहीं है, लेकिन कानून की पूरी संरचना से यह रोक निहित रूप से स्पष्ट होती है। अदालत ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 11 के अनुसार, जब सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है, तब कमर्शियल कोर्ट भी ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं कर सकती। कहा, कंपनी का वास्तविक या रचनात्मक कब्जा है या नहीं, यह तथ्यात्मक विवाद है। इसका निर्णय साक्ष्यों के आधार पर रेंट कंट्रोलर करेगा। अदालत ने रेंट कंट्रोलर को निर्देश दिया कि वह बेदखली वाद का शीघ्र निपटारा करें।
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