कोडरमा: झारखंड के कोडरमा में सरसों की खेती करने वाले किसानों के लिए बेहतर उत्पादन प्राप्त करने का अच्छा अवसर है. कोडरमा की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल उन्नत किस्मों का चयन, खेत की सही तैयारी, उचित दूरी पर बुवाई और संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल करके किसान सरसों की पैदावार बढ़ा सकते हैं. इसके लिए खेती के दौरान फसल की नियमित देखभाल और कीटों से बचाव पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है.
कृषि विज्ञान केंद्र कोडरमा के वरीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार राय ने विशेष बातचीत में जिले के किसानों को सरसों की वैज्ञानिक खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं. उन्होंने बताया कि किसान पारंपरिक तरीके से खेती करने के बजाय उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक प्रबंधन को अपनाकर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं. सरसों की खेती में बीज की मात्रा, पौधों के बीच की दूरी और पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल उत्पादन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं.
पीली और काली सरसों की खेती पर दें ध्यान
डॉ. अजय कुमार राय ने बताया कि सरसों की खेती में मुख्य रूप से पीली और काली सरसों की किस्में प्रचलित हैं. वर्तमान समय में किसान पीली सरसों की बुवाई कर रहे हैं, लेकिन काली सरसों की खेती में भी बेहतर उत्पादन की संभावना है. इसके लिए किसानों को उपयुक्त किस्म का चयन करने के साथ खेत की अच्छी तैयारी और फसल का उचित प्रबंधन करना चाहिए. उन्होंने काली सरसों की खेती के लिए बिरसा भाभा मस्टर्ड-1 किस्म का उपयोग करने की सलाह दी. उनके अनुसार कोडरमा की जलवायु के अनुरूप इस किस्म की खेती करते समय यदि किसान सही तकनीक अपनाते हैं, तो उन्हें अच्छा उत्पादन मिल सकता है.
खेत की तैयारी और बुवाई में रखें सावधानी
कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि सरसों की अच्छी पैदावार के लिए बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करना जरूरी है. खेत की मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए और जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए. बुवाई के दौरान किसानों को बीज की मात्रा का विशेष ध्यान रखना चाहिए. कई इलाकों में किसान खेत में जरूरत से ज्यादा बीज डाल देते हैं. इससे पौधे बहुत घने हो जाते हैं और उन्हें पर्याप्त जगह, पोषक तत्व तथा प्रकाश नहीं मिल पाता.
ऐसे में फसल की बढ़वार प्रभावित हो सकती है और उत्पादन में कमी आने की आशंका रहती है. उन्होंने सलाह दी कि सरसों की बुवाई कतारों में करनी चाहिए. पौधे से पौधे के बीच लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए. वहीं कतार से कतार के बीच लगभग 30 से 45 सेंटीमीटर की दूरी उपयुक्त है. इससे पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है और फसल की देखभाल करने में भी आसानी होती है.
संतुलित उर्वरक से बढ़ेगा उत्पादन
डॉ. राय ने बताया कि सरसों की फसल को बेहतर पोषण देने के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है. इसके साथ सल्फर का उपयोग भी सरसों की फसल के लिए लाभकारी है. सरसों की फसल में कीटों और रोगों का प्रकोप होने पर पौधों की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित हो सकता है. इसलिए किसानों को समय-समय पर खेत का निरीक्षण करना चाहिए. फसल में कीट या रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर उनकी सही पहचान कर कृषि विशेषज्ञों की सलाह से उचित उपचार करना चाहिए.
120 से 150 दिनों में तैयार होती है फसल
सरसों की फसल सामान्यतः लगभग 120 से 150 दिनों में तैयार हो जाती है. बुवाई के समय और किस्म के अनुसार कटाई का समय बदल सकता है. नवंबर में बुवाई करने वाले किसानों की फसल सामान्य परिस्थितियों में फरवरी से मार्च के बीच कटाई के लिए तैयार हो जाती है.