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कॉलेजियम के फैसलों की न्यायिक समीक्षा नहीं, RTI के दायरे से भी...


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कॉलेजियम के फैसलों की न्यायिक समीक्षा नहीं, RTI से भी बाहर, SC का अहम फैसला

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Supreme Court On Appointment Of Judges: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम के फैसले न न्यायिक समीक्षा के दायरे में हैं, न ही RTI के तहत. शीर्ष अदालत ने हिमाचल प्रदेश के अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर यह फैसला दिया है. इससे जजों की नियुक्ति के मसले पर एक अहम फैसला माना जा रहा है.

कॉलेजियम के फैसलों की न्यायिक समीक्षा नहीं, RTI से भी बाहर, SC का अहम फैसलाZoom

सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम द्वारा जजों की नियुक्त को लेकर एक अहम फैसला दिया है.

Supreme Court On Appointment Of Judges: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि कॉलेजियम द्वारा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के चयन की प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आती. शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि कॉलेजियम की चयन प्रक्रिया सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत भी नहीं आती और इस पर अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती.

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की अवकाशकालीन पीठ ने हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. मल्होत्रा ने आरोप लगाया था कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश के बावजूद उनके नाम पर उचित ढंग से विचार नहीं किया और हाईकोर्ट के जज पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को नजरअंदाज कर दिया.

कॉलेजियम के फैसलों में हम दखल नहीं देंगे

सुनवाई के दौरान पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि हम पैंडोरा बॉक्स नहीं खोलना चाहते. कॉलेजियम के फैसलों में हम दखल नहीं देंगे. अदालत ने कहा कि जजों के चयन की प्रक्रिया पूरी तरह कॉलेजियम के सब्जेक्टिव सैटिस्फेक्शन पर आधारित होती है और इस प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है.

मल्होत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने दलील दी कि 6 सितंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस द्वारा दो वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों, जिनमें अरविंद मल्होत्रा भी शामिल थे, की उम्मीदवारी पर एकतरफा फैसला लेने को गलत ठहराया था. उस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि चयन का निर्णय कॉलेजियम सामूहिक रूप से करेगा, न कि कोई एक व्यक्ति. इसके बावजूद कॉलेजियम ने उनकी उम्मीदवारी और उनके जवाबों पर विचार नहीं किया.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. पीठ ने कहा कि कॉलेजियम द्वारा किसी उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन कई पहलुओं के आधार पर किया जाता है और केवल वरिष्ठता किसी व्यक्ति को हाईकोर्ट का जज बनाए जाने का अधिकार नहीं देती. अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी जूनियर अधिकारी की सिफारिश की जाती है तो इससे वरिष्ठ अधिकारी को कानूनी चुनौती देने का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता.

न्यायिक समीक्षा नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों का चयन न तो न्यायिक समीक्षा के लिए खुला है और न ही यह सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी मांगने का विषय है. अदालत ने यह भी कहा कि एक बार हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सभी उपलब्ध दस्तावेजों और सरकार से प्राप्त सामग्री पर विचार कर अंतिम निर्णय ले लेता है, तो उसके बाद न्यायिक पक्ष से उस निर्णय की शुद्धता पर बहस नहीं की जा सकती.

गौरतलब है कि 2 जून को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों पर विचार और उम्मीदवारों से बातचीत के बाद तीन न्यायिक अधिकारियों- चिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल को हाईकोर्ट में जज नियुक्त किए जाने को मंजूरी दी थी. हालांकि, अदालत ने अरविंद मल्होत्रा को पूरी तरह निराश नहीं किया. पीठ ने उन्हें लंबित विभागीय जांच को शीघ्र पूरा कराने के लिए संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष प्रतिनिधित्व करने की स्वतंत्रता दी. साथ ही अदालत ने उनसे कहा कि आप अभी युवा हैं, थोड़ा इंतजार कीजिए.

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संतोष कुमार

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें



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