बेंगलुरु. करीब चार दशक तक ऊंची जेल की दीवारों और लोहे की सलाखों के बीच कैद रहने के बाद जब 72 वर्षीय साइबन्ना एन. नाटीकर ने परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल का मुख्य दरवाज़ा पार किया, तो उनके कदम बेहद धीमे थे. सफेद हो चुके लंबे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी और झुका हुआ शरीर बता रहा था कि वक्त ने उन्हें कितना बदल दिया है. जेल से बाहर निकली पहली सांस आज़ादी की जरूर थी, लेकिन उसके साथ बीते 38 सालों की परछाइयां भी थीं, जिन्हें शायद वह कभी पीछे नहीं छोड़ पाएंगे.
देश का सबसे लंबा समय जेल में बिताने वाला कैदी
कर्नाटक जेल विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, साइबन्ना देश के सबसे लंबे समय तक जेल में रहने वाले कैदी माने जाते हैं. डीजीपी (जेल) आलोक कुमार बताते हैं कि उन्होंने साइबन्ना को बेलगावी और कलबुर्गी जेलों में भी देखा था. उनके मुताबिक, जेल के भीतर उनका व्यवहार हमेशा अनुशासित और शांत रहा. लेकिन जेल के रिकॉर्ड में दर्ज यह अनुशासन उस अतीत को मिटा नहीं सकता, जिसने उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचाया.
शक ने पहली बार छीनी एक जिंदगी
साल 1988 में साइबन्ना पर अपनी पहली पत्नी मलकव्वा की हत्या का आरोप लगा. उन्हें शक था कि उनकी पत्नी का किसी और से संबंध है. इसी संदेह ने एक परिवार को खत्म कर दिया और अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई. यहीं से उनकी लंबी कैद की शुरुआत हुई.
पैरोल पर मिली आज़ादी भी नहीं बदल सकी किस्मत
1994 में उन्हें पैरोल मिली. जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने दूसरी शादी की. ऐसा लगा कि जिंदगी उन्हें दूसरा मौका दे रही है. नया परिवार बसा, एक बेटी विजयलक्ष्मी का जन्म हुआ और सब कुछ सामान्य होता दिखाई दिया. लेकिन यह सुकून बहुत कम समय का मेहमान साबित हुआ.
दूसरी बार दोहरी हत्या ने हमेशा के लिए बदल दी जिंदगी
कुछ ही सप्ताह बाद वही शक, वही गुस्सा और वही हिंसा फिर सामने आई. साइबन्ना ने अपनी दूसरी पत्नी नागम्मा और अपनी मासूम बेटी विजयलक्ष्मी की भी हत्या कर दी. आरोप था कि उन्हें दूसरी पत्नी पर भी बेवफाई का शक था. धारदार हथियार से की गई इस दोहरी हत्या ने उनके जीवन पर हमेशा के लिए एक ऐसा दाग लगा दिया, जिसे समय भी हल्का नहीं कर सका.
आज़ादी मिली, लेकिन क्या सच में लौट पाया जीवन?
38 साल बाद जेल से बाहर निकले साइबन्ना अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां न परिवार बचा, न रिश्ते और न ही कोई नया भविष्य. जेल के बाहर उनका स्वागत करने वाला कोई अपना नहीं था. उनके पास बची हैं तो सिर्फ यादें, अपराधों का इतिहास और एक लंबी कैद का बोझ. यह कहानी सिर्फ एक कैदी की रिहाई नहीं, बल्कि उस त्रासदी की है, जिसमें शक ने तीन जिंदगियां छीन लीं और एक इंसान की पूरी जिंदगी सलाखों के पीछे कैद कर दी.
हत्याओं के लिए कोई खास पछतावा नहीं
कोऑपरेटिव सेक्टर में काम करने वाले साइबन्ना ने कहा कि इन हत्याओं की वजह से उन्हें अपनी नौकरी और 10 एकड़ ज़मीन गंवानी पड़ी; उनका दावा है कि उस ज़मीन की कीमत आज 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा होती. इतने सालों तक जेल में रहने के बावजूद, उनका यही कहना रहा है कि उनकी पत्नियों के बेवफ़ा होने के सबूत थे, और उन्हें इन हत्याओं के लिए कोई खास पछतावा नहीं है.
कोर्ट ने सुनाई थी मौत की सजा
2003 में, एक ट्रायल कोर्ट ने अपराध की बर्बरता को देखते हुए उन्हें दूसरे दोहरे हत्याकांड के लिए मौत की सज़ा सुनाई थी. बाद में कर्नाटक हाई कोर्ट ने उनकी सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया. उनकी रिहाई कानूनी दखल के बाद हुई, जिसमें यह बात सामने आई कि उन्होंने लगभग एक दशक अकेले जेल की कोठरी में बिताया था, जिसे हाईकोर्ट ने गैर-कानूनी और अमानवीय करार दिया था. उनकी दया याचिका पर फ़ैसला लेने में हुई देरी का भी उन्हें फ़ायदा मिला, जिससे 37 साल बाद उनकी रिहाई हो सकी.
उठ रहे नए सवाल
साइबन्ना ने आलोक कुमार का शुक्रिया अदा किया और उन्हें एक उदार और सक्रिय अधिकारी बताया. उनकी रिहाई से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए पुराने सवालों पर बहस फिर से शुरू हो गई है. लंबे समय तक जेल में रहने और गैर-कानूनी तौर पर अकेले कोठरी में रखे जाने को किस बिंदु पर क्रूर और अमानवीय माना जाए? समाज को दोषी की उम्र, जेल में बिताए गए साल और जेल के अधिकारों के उल्लंघन को किए गए अपराधों की गंभीरता के साथ कैसे तौलना चाहिए?