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क्या आपको मालूम है देहरादून का नाम कैसे पड़ा? यहां जानिए ‘दरबार...


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देहरादून. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के केंद्र में स्थित गुरु राम राय दरबार साहिब केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि इतिहास, कला और वास्तुकला का एक अद्भुत संगम है. मुगल और गुलेर-कांगड़ा शैली के मिश्रण से बनी यह ऐतिहासिक इमारत अपने भीतर सदियों पुरानी कहानियों और बेजोड़ भित्ति चित्रों को समेटे हुए है. इसके निर्माण के पीछे दिलचस्प कहानी है.

सिखों के सातवें गुरु, गुरु हर राय जी के ज्येष्ठ पुत्र बाबा राम राय जी अपनी आध्यात्मिक शक्तियों और करामातों के लिए जाने जाते थे. देहरादून के इतिहासकार लोकेश ओहरी ने बताया कि वह जब मुगल शासक औरंगजेब ने उनकी करामात और आध्यात्मिक शक्ति को देखा, तो वह उनका बहुत बड़ा मुरीद हो गया. दरबार साहिब की सबसे बड़ी खासियत इसकी दीवारों पर उकेरी गई अनोखी भित्ति चित्रकारी है. उन्होंने कहा कि सदियों पहले बनाए गए इन चित्रों में आज भी गजब की चमक है, क्योंकि इन्हें बनाने में प्राकृतिक और वानस्पतिक रंगों का उपयोग किया गया था.गुलेर, कांगड़ा और मुगल शैली का यह अनूठा मिश्रण भारत की साझी संस्कृति का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है.

इतिहासकार डॉ लोकेश ओहरी ने बताया कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के हृदय स्थल में स्थित ‘गुरु राम राय दरबार साहिब’ सिर्फ सिखों का एक पवित्र धार्मिक स्थल ही नहीं है बल्कि यह इतिहास, बेजोड़ वास्तुकला और गहरी आध्यात्मिकता का एक जीवंत संगम है. सदियों पुराना यह परिसर देहरादून शहर की स्थापना और उसकी सांस्कृतिक पहचान से सीधा संबंध रखता है. मान्यता है कि इसी पावन स्थल पर ‘डेरा’ डालने के कारण ही इस घाटी का नाम ‘देहरादून’ पड़ा. आज यह स्थान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और इतिहासकारों के लिए आकर्षण का एक बड़ा केंद्र बना हुआ है.

इस भव्य दरबार साहिब के निर्माण की पृष्ठभूमि में सिखों के सातवें गुरु, गुरु हर राय जी के ज्येष्ठ पुत्र बाबा राम राय जी का गौरवशाली इतिहास जुड़ा हुआ है. अपनी कम आयु में ही बाबा राम राय जी अपनी असीम आध्यात्मिक शक्तियों, उच्च विचारों और लोक-कल्याणकारी चमत्कारों के लिए विख्यात हो चुके थे. सत्रहवीं शताब्दी में जब वे इस दून घाटी में आए तो यहाँ के शांत और प्राकृतिक वातावरण को देखकर उन्होंने इसे ही अपनी तपोभूमि और निवास स्थान के रूप में चुना.

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इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि दिल्ली का शक्तिशाली मुगल शासक औरंगजेब भी बाबा राम राय जी की आध्यात्मिक शक्तियों और करामातों से अत्यधिक प्रभावित था. जब औरंगजेब ने बाबा जी के चमत्कारों और उनकी दिव्य ऊर्जा को स्वयं देखा तो उसका अहंकार जाता रहा और वह उनका बहुत बड़ा प्रशंसक व मुरीद बन गया. बाबा राम राय जी के प्रति इसी गहरे आदर भाव के कारण औरंगजेब ने उनके इस धाम के निर्माण में विशेष रुचि दिखाई और आर्थिक और भूमि संबंधी सहायता भी की.

दरबार साहिब की इमारत स्थापत्य कला का एक बेजोड़ और दुर्लभ उदाहरण है. इस परिसर के निर्माण में मुगलकालीन वास्तुकला और पहाड़ी क्षेत्र की गुलेर-कांगड़ा शैली का एक बेहद सुंदर और संतुलित मिश्रण देखने को मिलता है. इसके विशाल गुंबद, ऊंचे मेहराब, नक्काशीदार स्तंभ और चारों कोनों पर बनी मीनारें जहाँ दिल्ली और आगरा के मुगल वैभव की याद दिलाती हैं वहीं इसकी सादगी और ढलानदार छतें स्थानीय पहाड़ी परिवेश की कला को खुद में समेटे हुए हैं.

गुरु राम राय दरबार साहिब की सबसे बड़ी और अनूठी खासियत इसकी दीवारों, छतों और मेहराबों पर उकेरी गई भव्य भित्ति चित्रकारी है. इन चित्रों में सिर्फ धार्मिक प्रसंग ही नहीं बल्कि तत्कालीन समाज, राजा-महाराजाओं के दरबार, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और लोकजीवन के विभिन्न दृश्यों को बेहद खूबसूरती से दर्शाया गया है. गुलेर, कांगड़ा और मुगल कला का यह अनूठा संगम भारत की उस साझी संस्कृति और बहुसांस्कृतिक विरासत का एक बेहतरीन प्रमाण है जहाँ विभिन्न कला विधाएं मिलकर एक हो जाती हैं. इन भित्ति चित्र की खास बात यह है कि सैकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद भी इनकी चमक आज भी वैसी ही बनी हुई है.

सदियों पहले के कलाकारों ने इन चित्रों को जीवंत करने के लिए किसी रासायनिक रंग का नहीं बल्कि पूरी तरह से प्राकृतिक पत्थरों, वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों और दुर्लभ मिट्टियों से तैयार रंगों का उपयोग किया था. यही वजह है कि समय की मार और मौसम के थपेड़ों को सहने के बाद भी ये रंग आज भी उतने ही तरोताजा और चमकदार दिखाई देते हैं.

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