जिस तरह हाफपैंट और नेकर की अपनी एक दिलचस्प कहानी है, ठीक उसी तरह शर्ट और बुशर्ट का अंतर भी बहुत कम लोगों को मालूम होगा. 99 फीसदी लोग इस बारे में शायद ही जानते होंगे आज के समय में लोग इन दोनों को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन असल में ये दोनों अलग होते हैं.
हालांकि ये सच है कि दोनों को ही भारत में अंग्रेज लेकर आए. इसके बाद ये तेजी से लोकप्रिय हुईं. एक बात और एक जमाने में शर्ट को अंडर गारमेंट ज्यादा माना जाता था. तो इनके भारत आने और छाने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. ‘बुशर्ट’ शब्द असल में ‘बुश’ से आया है, जिसका अंग्रेजी में अर्थ होता है झाड़ियां या जंगल. शर्ट को जहां ‘अनुशासन और औपचारिकता’ से जोड़ते हैं तो बुशर्ट को ‘आराम’ से.
शर्ट और बुशर्ट में क्या अंतर
शर्ट को पैंट के अंदर दबाकर यानि इन करके पहनने के लिए डिजाइन किया जाता है. इसकी लंबाई थोड़ी ज्यादा होती है ताकि हाथ उठाने या झुकने पर यह पैंट से बाहर न निकले. बुशर्ट को हमेशा पैंट या ट्राउजर के बाहर पहना जाता है. इसे पैंट के अंदर इन नहीं किया जाता.
शर्ट को पैंट के अंदर दबाकर यानि इन करके पहनने के लिए डिजाइन किया जाता है. इसकी लंबाई थोड़ी ज्यादा होती है बुशर्ट को बाहर पहना जाता है. (AI Photo)
फॉर्मल शर्ट का निचला हिस्सा घुमावदार होता है, जिसे ‘टेल’ कहा जाता है. ये इसलिए होता है ताकि शर्ट पैंट के अंदर ठीक से टिकी रहे. इसका निचला हिस्सा बिल्कुल सीधा और सपाट होता है. चूंकि इसे बाहर ही रखना होता है, इसलिए इसका सीधा कट इसे एक साफ-सुथरा और व्यवस्थित लुक देता है.
शर्ट में कॉलर के नीचे एक ‘स्टैंड’ होता है, जिससे कॉलर थोड़ा कड़ा और खड़ा रहता है. इसमें गले के बिल्कुल पास भी एक बटन होता है, ताकि टाई लगाई जा सके. वहीं बुशर्ट का कॉलर ढीला-ढाला और फ्लैट होता है, जिसे ‘कैंप कॉलर’ या ‘सफारी कॉलर’ कहते हैं. यह वी-शेप में खुला रहता है. इसमें टाई लगाने की कोई जगह नहीं होती। यह पूरी तरह हवादार और आरामदायक होता है.
फॉर्मल शर्ट में आमतौर पर बाईं तरफ केवल एक ही जेब होती है या कई बार एक भी नहीं होती. पारंपरिक बुशर्ट में सामने की तरफ दो या चार बड़ी जेबें होती हैं, जिनमें ऊपर से बंद करने के लिए फ्लैप और बटन लगे होते हैं.
बुशर्ट की रोचक कहानी
19वीं और 20वीं सदी में जब ब्रिटिश और यूरोपीय लोग अफ्रीका या भारत के जंगलों में शिकार या खोजबीन के लिए जाते थे, तो उन्हें एक ऐसे कपड़े की जरूरत होती थी जो बेहद आरामदायक हो, जिसमें गर्मी न लगे और जिसमें सामान रखने के लिए बहुत सारी जेबें हों. इसी जरूरत के लिए जो शर्ट बनाई गई, उसे ‘बुश शर्ट’ या ‘सफारी शर्ट’ कहा गया. चूंकि इसे जंगलों और झाड़ियों में पहना जाता था, इसलिए इसका नाम बुशर्ट पड़ गया.
बुशर्ट का आविष्कार कठिन मौसम और स्थितियों में पहनने वाले पोशाक के तौर पर हुई. (AI Photo)
भारत में पॉपुलर
भारत की गर्म जलवायु के लिए बुशर्ट एकदम मुफीद थी. आजादी के बाद, 1960 से लेकर 1980 के दशक तक भारतीय दफ्तरों के बाबू, सरकारी अफसरों और नेताओं के बीच ‘बुशर्ट और पैंट’ का कॉम्बिनेशन बेहद लोकप्रिय हुआ.
दोनों को लाने का श्रेय अंग्रेजों को
शर्ट और बुशर्ट दोनों को ही भारत में लाने का श्रेय अंग्रेजों और यूरोपीय व्यापारियों को जाता है. इससे पहले भारत में धोती, कुर्ता, अंगरखा और मिर्जई पहने जाते थे. आज जिसे हम फॉर्मल शर्ट कहते हैं, वह कभी कोट के नीचे पहना जाने वाला एक अदना सा कपड़ा हुआ करती थी.
18वीं और 19वीं सदी की शुरुआत तक यूरोप में शर्ट को एक ‘अंडरवियर’ की तरह माना जाता था. इसे सीधे बदन पर पहना जाता था. इसके ऊपर वेस्टकोट या कोट पहनना अनिवार्य था. समाज में बिना कोट के केवल शर्ट में दिखना अभद्रता या ‘नंगा’ होने जैसा माना जाता था.
उस दौर में शर्ट पूरी सफेद होती थी. जो अमीर होते थे, उनके कॉलर हमेशा साफ और कड़े होते थे क्योंकि वे शारीरिक श्रम नहीं करते थे. यहीं से ‘व्हाइट कॉलर जॉब’ शब्द निकला.
अंग्रेज जब भारत में शर्ट लेकर आए तो उन्होंने बंगाल के आफिस में क्लर्कों के लिए इसका पहनना जरूरी कर दिया. तब बंगाल के क्लर्क आमतौर पर नीचे धोती और ऊपर शर्ट पहना करते थे. (AI Photo)
पहले भारत में धोती पर पहनते थे शर्ट
ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी और ब्रिटिश अफसर जब भारत आए, तो वे अपनी इसी थ्री-पीस सूट और शर्ट वाली संस्कृति को साथ लेकर आए. भारतीयों के लिए शुरू में यह एक कौतुक की चीज थी. अंग्रेजों ने जब भारत में प्रशासनिक काम के लिए भारतीय क्लर्कों की फौज तैयार की, तो उनके लिए एक खास ड्रेस कोड बनाया गया.
धोती के ऊपर शर्ट पहनना इसी ‘बाबू संस्कृति’ की देन है. धीरे-धीरे भारतीय पुरुषों ने कुर्ते की जगह शर्ट को अपना लिया क्योंकि इसकी फिटिंग और बटन वाले कफ काम करने में ज्यादा व्यावहारिक थे.