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सपनों का टूटना या चंद रुपयों की मजबूरी? डॉक्टर-नर्स बनने वाली टॉपर...


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NEET Solver Gang Toppers Arrested: नीट सॉल्वर गैंग से जुड़ा हैरान करने वाला अपडेट सामने आया है. झारखंड की स्टेट टॉपर पूनम और पलामू की चंचल कुमारी डमी कैंडिडेट बनकर दूसरों के नाम पर नीट परीक्षा दे रही थीं. दोनों टॉपर आखिर नीट सॉल्वर कैसे बन गईं? जानिए 18 बायोमेट्रिक कर्मियों की गिरफ्तारी और 5 राज्यों में फैले इस फर्जीवाड़े के सिंडिकेट का सच.

सपनों का टूटना या मजबूरी? डॉक्टर-नर्स बनने वाली टॉपर बेटियां कैसे बनीं सॉल्वर?Zoom

NEET Solver Gang: नीट सॉल्वर गैंग में 2 टॉपर लड़कियां भी शामिल थीं

नई दिल्ली (NEET Solver Gang Toppers Arrested). यह कहानी सिर्फ पेपर लीक या परीक्षा में होने वाले किसी आम फर्जीवाड़े की नहीं है. यह कहानी है उन चमकते सपनों के असमय टूटने और बिखरने की, जो कभी अपने राज्य और जिले की टॉपर लिस्ट में सबसे ऊपर चमके थे. नीट यूजी री-टेस्ट 2026 के दौरान जब पुलिस ने बिहार के लखीसराय में अंतरराज्यीय सॉल्वर गैंग का भंडाफोड़ किया तो कई गिरफ्तारियों ने चौंका दिया. इस गिरोह में कोई प्रोफेशनल अपराधी नहीं, बल्कि देश के नामी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों के छात्र और ‘स्टेट टॉपर’ रहीं 2 बेटियां शामिल हैं- झारखंड की पूनम कुमारी और पलामू की चंचल कुमारी.

पेशेवर अपराधियों के अपराध करने पर समाज को ज्यादा हैरानी नहीं होती. लेकिन जब देश के टॉप कॉलेज में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स और बोर्ड परीक्षा के होनहार टॉपर्स ही ‘सॉल्वर गैंग’ के मोहरे बन जाएं तो समझ जाना चाहिए कि खराबी सिर्फ परीक्षा सिस्टम में नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में भी है. कानून इन बच्चों को सलाखों के पीछे तो भेज देगा, लेकिन क्या हमारा समाज और सिस्टम इन टूटते सपनों, महंगी होती पढ़ाई और आर्थिक तंगी से घिरे युवाओं को कोई सुरक्षित रास्ता दे पाएगा? समझिए नीट यूजी सॉल्वर गैंग के नेक्सस की पूरी कहानी.

आर्थिक तंगी और लगातार असफलता पड़ी भारी

2021 में पूनम कुमारी झारखंड 12वीं साइंस टॉपर थी. पिता हर महीने 7,000 रुपये वाराणसी भेजते थे, जिससे बेटी BHU में बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई कर सके. लेकिन 3 बार नीट देने के बाद भी सफलता न मिलना, महंगी कोचिंग का खर्च और घर की गरीबी ने मिलकर पूनम पर ऐसा मानसिक और आर्थिक दबाव बनाया कि वो शॉर्टकट के खतरनाक रास्ते पर चल पड़ी. पढ़ाई का बहाना बनाकर पूनम 7 महीने से घर भी नहीं गई थी. फिर ‘मधुप्रिया’ नाम की कैंडिडेट की जगह परीक्षा देने लखीसराय पहुंच गई.

चंचल कुमारी की कहानी भी अलग नहीं है. साल 2016 में पलामू जिला टॉपर बनी चंचल फिलहाल ओडिशा के एक सरकारी आयुर्वेदिक कॉलेज में बीएएमएस (BAMS) के फाइनल ईयर की छात्रा है. उसके 2 भाई आयुर्वेद चिकित्सक हैं और वो अपनी बहन को भी डॉक्टर बनते देखना चाहते थे. लेकिन चंद रुपयों के लालच या किसी शातिर के बहकावे में आकर चंचल ने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी. वह ‘नंदनी राज’ नाम की मूल परीक्षार्थी की जगह डमी कैंडिडेट बनकर परीक्षा हॉल में बैठी थी.

‘सॉल्वर सिंडिकेट’ कैसे काम करता है?

लखीसराय एसपी प्रेरणा कुमार के मुताबिक, यह खेल केवल परीक्षा हॉल में बैठकर पेपर सॉल्व करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में अंदरूनी मिलीभगत का बहुत बड़ा सिंडिकेट है.

  • फर्जी पहचान पत्र: डमी अभ्यर्थियों को परीक्षा केंद्रों में एंट्री दिलाने के लिए सबसे पहले उनके फर्जी पहचान पत्र और आधार कार्ड तैयार किए जाते हैं, जिन पर चेहरा डमी कैंडिडेट का होता है और नाम असली छात्र का.
  • बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन में सेंध: इस फर्जीवाड़े का सबसे डरावना पहलू यह है कि पुलिस ने जांच के दौरान 18 बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन कर्मियों को भी गिरफ्तार किया है.. यानी उंगलियों के निशान मैच कराने वाले कर्मचारी ही इस गिरोह से मिले हुए थे.
  • अंतरराज्यीय नेटवर्क: पुलिस की प्रारंभिक जांच में इस गिरोह के तार बिहार, झारखंड, दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक जुड़े होने के संकेत मिले हैं. गिरफ्तार लोगों में दिल्ली, मधेपुरा और मुजफ्फरपुर के कई नामी मेडिकल छात्र भी शामिल हैं.

समाज और माता-पिता के लिए कभी न भूलने वाला दर्द

नीट फर्जीवाड़ा कांड ने परीक्षा की शुचिता तो भंग की ही है, लेकिन उससे भी ज्यादा कई हंसते-खेलते परिवारों के गर्व और प्रतिष्ठा को हमेशा के लिए दफन कर दिया है. पूनम के पिता बालेश्वर प्रसाद राणा अपनी बेटी के कृत्य से इतने दुखी और हैरान हैं कि उन्होंने कैमरे के सामने रोते हुए कहा- मेरी बेटी ने घर और पूरे गांव की इज्जत मिट्टी में मिला दी है, मैं अब उससे जेल में मिलने तक नहीं जाऊंगा. वहीं चंचल के भाई भी हैरान हैं कि उनकी बहन इस दलदल में कैसे फंस गई.

क्यों दलदल की तरफ खिंच रहे हैं मेधावी स्टूडेंट्स?

शिक्षाविदों और जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं. पहला कारण है नीट जैसी परीक्षाओं के लिए कोचिंग सेंटर की लाखों की फीस. दूसरा, मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में एडमिशन मिलने के बाद भी हॉस्टल, किताबों और रहने का खर्च उठा पाना गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बेहद मुश्किल होता है. जब इन स्टूडेंट्स को अपनी जरूरतों के लिए पैसों की किल्लत होती है तो सॉल्वर गैंग के मास्टरमाइंड इनका फायदा उठाते हैं. वे इन चमकते हुए दिमागों को चंद रुपयों या तुरंत अमीर बनने का लालच देकर अपनी ढाल बना लेते हैं और मेधावी छात्र बिना अंजाम सोचे इस चक्रव्यूह में फंस जाते हैं.

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Deepali PorwalSenior Sub Editor

Deepali Porwal is a seasoned bilingual journalist with 11 years of experience in the media industry. She currently works with News18 Hindi, focusing on the Education and Career desk. She is known for her versat…और पढ़ें



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