गाज़ीपुर के चीतनाथ घाट के पास एक ऐसा मंदिर है, जिसकी नींव किसी आम कहानी से नहीं, बल्कि रामायण काल की एक तपस्या से जुड़ी बताई जाती है बाबा कोटेश्वर नाथ मंदिर. यही वजह है कि गाज़ीपुर को छोटी काशी या लहुरी काशी के नाम से भी जाना जाता है.
राजा गाधि की तपस्या और लहुरी काशी का वरदान
मंदिर के पुजारी बावन दाश बताते हैं कि त्रेता युग में राजा विश्वामित्र के पिता, राजा गाधि ने इसी स्थान पर बैठकर कठोर तपस्या की थी.उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ प्रकट हुए और उन्होंने राजा गाधि से वरदान मांगने को कहा,इस पर राजा गाधि ने इच्छा जताई कि वे जिस स्थान पर बैठकर तप कर रहे हैं, उसे भी काशी बना दिया जाए.
तब भगवान भोलेनाथ ने कहा कि काशी तो पहले से ही मौजूद है, इसलिए इस पावन भूमि को ‘छोटी काशी’ यानी ‘लहुरी काशी’ बना दिया जाता है.ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग उसी रामायण काल का है, इसके साथ ही मंदिर में माता पार्वती, भगवान गणेश और लगभग 30-40 साल पहले स्थापित हुई काल भैरव की प्रतिमा भी विराजमान है.
शिव पुराण में भी है इसका उल्लेख
मंदिर के एक और पुजारी गोपाल गोस्वामी इस कथा की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि यह प्रसंग शिव पुराण में भी दर्ज है. उनके मुताबिक, जब राजा गाधि ने यह स्थान काशी जैसा बनाने का वरदान मांगा, तो भोलेनाथ ने कहा “जहां ज्ञान है, वही काशी है.” उनका कहना है कि महादेव ने यह भी बताया था कि जितना ज्ञान काशी में मिलेगा, उतना ही ज्ञान इस छोटी काशी में भी प्राप्त होगा ,जिस तरह वहाँ गंगा के किनारे मंदिर और मुक्ति का धाम है, वैसे ही इस पावन स्थल पर भी उतनी ही मुक्ति और पवित्रता मिलेगी
सावन में उमड़ती है आस्था की भीड़
गोपाल गोस्वामी बताते हैं कि सावन के महीने में मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है.श्रद्धालु सुबह साढ़े तीन बजे से ही मंदिर पहुंचना शुरू कर देते हैं, और सोमवार को तो भीड़ का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल हो जाता है, लोग विशेष मनौतियां मांगने, रुद्राभिषेक और जलाभिषेक कराने के लिए दूर-दूर से यहां आते हैं.