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घर से बाग तक, देवघर की 50 महिलाएं आम बेचकर रोज 1200...


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Mango Farming: जिन हाथों ने कभी सिर्फ घर संभाला, आज वही हाथ आम के बगीचों से लाखों उम्मीदें सींच रहे हैं. देवघर की ग्रामीण महिलाएं अब नौकरी नहीं, बल्कि खुद रोजगार पैदा कर रही हैं. पेड़ों पर लटकते आम इन महिलाओं की मेहनत, संघर्ष और आत्मनिर्भरता की नई कहानी कह रहे हैं. रिखिया प्रखंड की महिलाएं आज आम के बगीचों के सहारे अपनी अलग पहचान बना रही हैं. एक समय था, जब इन महिलाओं के पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं था और वे पूरी तरह परिवार की आमदनी पर निर्भर रहती थीं.

लेकिन आज यही महिलाएं अपने बगीचों में उगाए गए आम को बाजार तक पहुंचाकर अच्छी कमाई कर रही हैं. उनकी मेहनत और लगन ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही मार्गदर्शन और सरकारी सहयोग मिले, तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के बड़े अवसर पैदा किए जा सकते हैं.

राज्य सरकार की बिरसा हरित ग्राम योजना के तहत वर्ष 2018 में महिलाओं को आम की बागवानी के लिए प्रोत्साहित किया गया था. योजना के अंतर्गत प्रति एकड़ 112 आम के पौधे उपलब्ध कराए गए. शुरुआत में यह पहल महिलाओं के लिए एक नया अनुभव था. कई महिलाओं को बागवानी की तकनीकी जानकारी नहीं थी और उन्हें पौधों की देखभाल में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार अपने बगीचों की देखभाल करती रहीं. आज रिखिया प्रखंड में लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में करीब 50 महिलाएं आम की बागवानी से जुड़ी हुई हैं और इसका लाभ उठा रही हैं.

गांव की महिला सीता देवी ने लोकल 18 के संवाददाता से बातचीत करते हुए कहा कि शुरुआती वर्षों में महिलाओं के सामने कई चुनौतियां आईं. कहीं मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी नहीं थी, तो कहीं पौधे सूख गए. मौसम की मार और तकनीकी जानकारी की कमी के कारण उत्पादन को लेकर भी चिंता बनी रहती थी.

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लेकिन मनरेगा और जेएसएलपीएस के सहयोग से महिलाओं को समय-समय पर प्रशिक्षण और आवश्यक सहायता मिलती रही. महिलाओं ने धैर्य और मेहनत के साथ इन चुनौतियों का सामना किया. वर्षों की मेहनत का परिणाम अब उनके सामने है, जब बगीचों में लगे पेड़ फलों से लदे हुए हैं और अच्छी पैदावार दे रहे हैं.

रिखिया क्षेत्र के हिंदणा पूर्वी गांव की महिलाओं के लिए यह वर्ष खास महत्व रखता है. पहली बार उन्हें अपने बगीचे के आम बेचकर सीधे आय अर्जित करने का अवसर मिला है. पहले आम को स्थानीय व्यापारियों को बेचने की मजबूरी होती थी, जहां उचित मूल्य नहीं मिल पाता था. मेहनत के अनुसार लाभ नहीं मिलने से कई बार निराशा भी होती थी. लेकिन इस बार जिला प्रशासन ने महिलाओं की मदद के लिए विभिन्न प्रखंडों में बिक्री स्टॉल की व्यवस्था की है. इससे महिलाएं सीधे ग्राहकों तक अपने उत्पाद पहुंचा रही हैं और उन्हें बेहतर कीमत मिल रही है.

रानी देवी ने बताया कि इन स्टॉलों के माध्यम से वे प्रतिदिन लगभग 1000 से 1200 रुपये तक की कमाई कर रही हैं. इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और घर की जरूरतों को पूरा करना आसान हो गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि महिलाएं अब सिर्फ खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उत्पादन, प्रबंधन और विपणन की जिम्मेदारी भी खुद संभाल रही हैं. आम तोड़ने, उसकी छंटाई करने, बाजार तक पहुंचाने और बिक्री करने तक का पूरा कार्य महिलाएं स्वयं कर रही हैं.

देवघर में आम की बागवानी से जुड़ी यह पहल ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण का बेहतरीन उदाहरण बनकर उभरी है. इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़े हैं, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास भी बढ़ा है. आज ये महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी होकर यह संदेश दे रही हैं कि मेहनत, धैर्य और सही सहयोग मिलने पर खेती भी सम्मानजनक आय का मजबूत साधन बन सकती है. आने वाले समय में यह मॉडल अन्य गांवों और जिलों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है.



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