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छपरा के किसान अशोक सिंह का संघर्ष, आटा मिल हादसे में कटा...


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Chhapra News: अशोक सिंह कहते है कि उनके संघर्ष की असली पैदावार बेटे की सफलता है. जिसे देखकर उन्हें अंदर से बहुत खुशी मिलती है और अपने हाथ खोने का कोई अफसोस नहीं होता. वे किसानों से अपील करते है कि अगर खुद नौकरी नहीं कर पाए तो भी अपने बच्चों को सफल बनाने के लिए पूरी मेहनत और संघर्ष करें. उनकी हर जरूरत पूरी करें. एक दिन आपका बच्चा जरूर सफल होगा.

छपरा के किसान अब सिर्फ खेती नहीं कर रहे, बल्कि अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाकर उन्हें काबिल भी बना रहे है. आज हम ऐसे ही एक किसान की कहानी बता रहे है. जिन्होंने खेती-किसानी के भरोसे न सिर्फ परिवार चलाया, बल्कि बेटे को अधिकारी भी बनाया. यह कहानी है बनियापुर प्रखंड के सोहाई निवासी अशोक सिंह की. जिन्होंने खेती से हुई आमदनी से बेटे आलोक कुमार सिंह की पढ़ाई कराई और उसे सफल बनाने के लिए हर कठिनाई झेली. संघर्ष की इसी राह में आटा मिल चलाते समय उनका एक हाथ कट गया. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. आज उनका बेटा आलोक सिंह नेवी में CO के पद पर तैनात है.

अशोक सिंह पारंपरिक फसलों के साथ-साथ नगदी फसल की भी खेती करते है. उनके पास 10 एकड़ से अधिक जमीन है. जिस पर हरी सब्जियां, धान, गेहूं और मक्का की खेती होती है. उन्हें बागवानी का भी शौक है. अपने बगीचे में उन्होंने आम के दो दर्जन से अधिक किस्मों के पौधे लगाए है.

अशोक सिंह ने बेटे को सफल बनाने के लिए खेती को ही सहारा बनाया. खेत में उगाई गई फसल और नगदी फसलों को बेचकर वे बेटे की जरूरतों पर पैसा खर्च करते थे. घर का खर्च, बेटे आलोक सिंह की कोचिंग, ट्यूशन, स्कूल, कॉपी-किताब से लेकर कॉलेज तक की पूरी पढ़ाई खेती की आमदनी से ही चलती थी.

घर और पढ़ाई का खर्च चलाने के बाद जब कुछ पैसा बचा तो अशोक सिंह ने एक छोटा आटा मिल शुरू किया. आटा मिल की मशीन चलाते समय उनका हाथ पट्टे में फंस गया. किसी तरह उन्होंने खुद को तो बचा लिया. लेकिन हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया. इलाज के दौरान डॉक्टरों को उनका हाथ काटना पड़ा और वे दिव्यांग हो गए. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. ठीक होते ही वे एक हाथ से ही पूरी ऊर्जा के साथ फिर खेत में जुट गए और खेती से होने वाली आमदनी से बेटे की पढ़ाई जारी रखी.

आलोक सिंह ने भी पिता के संघर्ष और दर्द को देखते हुए पूरी ईमानदारी से पढ़ाई की और नेवी में नौकरी हासिल कर ली. फिलहाल आलोक सिंह मुंबई में CO के पद पर कार्यरत है. अब वे पिता को ज्यादा मेहनत नहीं करने देते. स्थानीय बाजार में उनके लिए एक छोटा सा बिजनेस शुरू कर दिया है. जहां अशोक सिंह बैठते हैं, साथ ही समय-समय पर अपने बगीचे और खेतों का मुआयना करते है. खेती के ज्यादातर काम अब मजदूरों के जरिए कराए जाते है.

लोकल 18 से बातचीत में अशोक सिंह ने बताया कि उन्होंने शुरू से ही ठान रखा था कि वे बेटे को अधिकारी बनाएंगे. इसके लिए वे खेत में जी-जान से मेहनत करते थे और फसल बेचकर मिली कमाई बेटे की पढ़ाई पर खर्च करते थे. बाद में आटा मिल शुरू किया. लेकिन हादसे में हाथ पट्टे में फंस गया और डॉक्टरों ने हाथ काट दिया. अशोक सिंह कहते है कि इसके बाद भी उन्होंने हौसला नहीं खोया.

अशोक सिंह कहते है कि उनके संघर्ष की असली पैदावार बेटे की सफलता है. जिसे देखकर उन्हें अंदर से बहुत खुशी मिलती है और अपने हाथ खोने का कोई अफसोस नहीं होता. वे किसानों से अपील करते है कि अगर खुद नौकरी नहीं कर पाए तो भी अपने बच्चों को सफल बनाने के लिए पूरी मेहनत और संघर्ष करें. उनकी हर जरूरत पूरी करें. एक दिन आपका बच्चा जरूर सफल होगा.



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