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जब ‘बाघ देश’ पलामू में मचता था पक्षियों का कत्लेआम, पेरिस की...


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आज देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करने वाला पलामू टाइगर रिजर्व कभी ‘बाघ देश’ के नाम से मशहूर था. उस दौर में यहां बाघों और अन्य वन्यजीवों की भरमार थी. अपनी समृद्ध जैव-विविधता और घने जंगलों के कारण पलामू की पहचान देश ही नहीं, दुनिया भर में थी. यहां के जंगल वन्यजीवों और दुर्लभ पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय माने जाते थे. 

पलामू: झारखंड का पलामू टाइगर रिजर्व आज देश-विदेश के पर्यटकों के बीच खास पहचान बना चुका है. प्राकृतिक सुंदरता और वन्यजीवों के कारण यह लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है. हालांकि, पलामू का इतिहास आज से कहीं अधिक समृद्ध और रोचक रहा है. एक समय ऐसा भी था जब यह क्षेत्र ‘बाघ देश’ के नाम से जाना जाता था. उस दौर में पलामू न केवल बाघों और अन्य वन्यजीवों की बड़ी आबादी के लिए प्रसिद्ध था, बल्कि अपनी अनूठी जैव-विविधता के कारण भी दुनिया भर में चर्चित था.

अनेक प्रकार के पक्षियों की भरमार
पलामू जिले के विशेषज्ञ डॉ. डी. एस. श्रीवास्तव ने लोकल18 को बताया कि यह कहानी सैकड़ों वर्ष पुरानी है. उस समय पलामू के घने जंगल, तालाब, आहर और प्राकृतिक जलस्रोत वन्यजीवों और पक्षियों के लिए आदर्श आवास माने जाते थे. यहां बाघ, हिरण और अनेक प्रकार के पक्षियों की भरमार थी. इन्हीं पक्षियों में किंगफिशर भी शामिल था, जो अपने आकर्षक और रंग-बिरंगे पंखों के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध था. उस समय यह पक्षी क्षेत्र के लगभग हर जलस्रोत के आसपास आसानी से देखा जा सकता था.

चमकीले पंखों की विदेशों में मांग
उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पलामू के जंगलों में किंगफिशर पक्षियों की बड़ी संख्या मौजूद थी. लेकिन इनके सुंदर और चमकीले पंखों की विदेशों में काफी मांग थी. इसी कारण पटना के मीरशिकार टोली से शिकारी दल पलामू पहुंचते थे और बड़ी संख्या में इन पक्षियों का शिकार करते थे. पक्षियों को पकड़कर उनके रंगीन पंख निकाले जाते थे, जिन्हें व्यापारिक माध्यमों से फ्रांस की राजधानी पेरिस भेजा जाता था.

पेरिस की महिलाओं के फैशनेबल हैट
बताया जाता है कि उस दौर में पेरिस की महिलाओं के फैशनेबल हैट और परिधानों को सजाने के लिए इन रंग-बिरंगे पंखों का इस्तेमाल किया जाता था. केवल किंगफिशर ही नहीं, बल्कि अन्य पक्षियों और वन्यजीवों के अंगों का भी व्यापार होता था. स्थानीय स्तर पर चैनपुर और शाहपुर क्षेत्र के बहेलिया समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में पक्षियों का शिकार करते थे. शिकार किए गए पक्षियों की खाल और पंखों को सुखाकर व्यापारियों को बेच दिया जाता था.

वैश्विक फैशन उद्योग की मांग
डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, इन तथ्यों का उल्लेख वर्ष 1895 के सर्वे एवं सेटलमेंट रिकॉर्ड में मिलता है. तत्कालीन अधिकारी डी.एच.आई. सैंडर्स द्वारा तैयार पलामू संबंधी पहली रिपोर्ट में भी ऐसी गतिविधियों का जिक्र किया गया है. पलामू का यह इतिहास न केवल इसकी समृद्ध जैव-विविधता की कहानी बताता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस तरह वन्यजीवों और पक्षियों का शिकार कभी वैश्विक फैशन उद्योग की मांग को पूरा करने के लिए किया जाता था. आज जब वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा पर विशेष जोर दिया जा रहा है, तब पलामू का यह इतिहास प्रकृति और जैव-विविधता के संरक्षण के महत्व की महत्वपूर्ण याद दिलाता है.

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Amita kishor

न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें



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