Siddaramaiah Vs Mallikarjun Kharge in Karnataka Politics: कर्नाटक की राजनीति में कई ऐसे मोड़ आए हैं, जिसने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तक बदल दी. ऐसा ही एक मोड़ था 2013 का विधानसभा चुनाव, जब कांग्रेस की सत्ता में वापसी के साथ मुख्यमंत्री पद की लड़ाई ने दो बड़े नेताओं- सिद्दारमैया और मल्लिकार्जुन खरगे को आमने-सामने ला खड़ा किया. यह सिर्फ दो नेताओं के बीच की प्रतिस्पर्धा नहीं थी, बल्कि कांग्रेस के भीतर बदलते सामाजिक समीकरणों, संगठनात्मक रणनीति और सोनिया गांधी के नेतृत्व में लिए गए राजनीतिक फैसलों की कहानी भी थी. इसी लड़ाई ने एक ओर सिद्दारमैया को कर्नाटक का सबसे प्रभावशाली नेता बना दिया, तो दूसरी ओर मल्लिकार्जुन खरगे का मुख्यमंत्री बनने का सपना एक बार फिर अधूरा रह गया.
कांग्रेस में सिद्दारमैया की एंट्री: अहमद पटेल का मास्टरस्ट्रोक
सिद्दारमैया मूल रूप से जनता दल परिवार की राजनीति से निकले नेता थे. वे एचडी देवेगौड़ा के करीबी माने जाते थे और जनता दल (सेक्युलर) में तेजी से उभरे थे. लेकिन 2005-06 में देवेगौड़ा परिवार के साथ उनका टकराव बढ़ गया. अंततः उन्हें जेडी (एस) से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. पार्टी से निष्कासन के बाद सिद्दारमैया ने ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव जनता दल (AIPJD) नाम से अलग राजनीतिक मंच बनाने की कोशिश की, लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में अपेक्षित सफलता नहीं मिली. यहीं से उन्हें एहसास हुआ कि क्षेत्रीय दल के सहारे राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करना आसान नहीं होगा.
इसी दौरान उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व से संपर्क साधा. इस पूरी प्रक्रिया के सूत्रधार थे सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार अहमद पटेल. उन्होंने सिद्दारमैया की राजनीतिक उपयोगिता को समझा. खासकर पिछड़े वर्ग, दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच उनकी पकड़ को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व को लगा कि कर्नाटक में भाजपा और जेडी(एस) के खिलाफ एक बड़ा सामाजिक गठबंधन तैयार किया जा सकता है.
अहमद पटेल ने सिद्दारमैया की मुलाकात सोनिया गांधी से कराई. वरिष्ठ नेता एके एंटनी को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया. अंततः 2006 में बेंगलुरु में आयोजित एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में सोनिया गांधी ने स्वयं सिद्दारमैया का कांग्रेस में स्वागत किया. यह सिर्फ एक राजनीतिक कदम नहीं था, बल्कि कांग्रेस की भविष्य की रणनीति का हिस्सा था.
कांग्रेस में तेजी से बढ़ता कद
कांग्रेस में आने के बाद सिद्दारमैया ने खुद को केवल एक पूर्व जेडी(एस) नेता तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने अपने पुराने सामाजिक आधार को कांग्रेस के साथ जोड़ना शुरू किया. उनका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार था अहिंदा फार्मूला. यानी अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित. यही वह सामाजिक गठबंधन था जिसने उन्हें कांग्रेस के पारंपरिक नेताओं से अलग पहचान दी. धीरे-धीरे वे राज्य में कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय जननेता बन गए. विपक्ष में रहते हुए उन्होंने भाजपा सरकारों के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया और जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई. इस दौरान कांग्रेस में कई दिग्गज नेता मौजूद थे- मल्लिकार्जुन खरगे, जी. परमेश्वर, डी.के. शिवकुमार और अन्य वरिष्ठ चेहरे. लेकिन जनाधार और जनसभाओं में भीड़ जुटाने की क्षमता के मामले में सिद्दारमैया लगातार आगे निकलते गए.
2013: मुख्यमंत्री पद की निर्णायक लड़ाई
2013 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण था. भाजपा आंतरिक कलह से जूझ रही थी और कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला. लेकिन जीत के बाद सबसे बड़ा सवाल था- मुख्यमंत्री कौन बनेगा? मुख्यमंत्री पद की दौड़ में मुख्य रूप से तीन नाम थे- मल्लिकार्जुन खरगे, जी. परमेश्वर और सिद्दारमैया. खरगे उस समय कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते थे. वे पहले भी कई बार मुख्यमंत्री पद के करीब पहुंचे थे. 1999 में कांग्रेस की जीत के बाद उन्हें मौका नहीं मिला और एसएम कृष्णा मुख्यमंत्री बने. 2004 में भी वे मजबूत दावेदार थे, लेकिन समझौते के उम्मीदवार के रूप में एन. धरम सिंह को चुना गया. 2013 में उन्हें लगा कि तीसरी बार शायद किस्मत उनका साथ देगी. लेकिन राजनीतिक समीकरण बदल चुके थे.
सिद्दारमैया के पक्ष में सबसे बड़ी ताकत थी विधायकों का समर्थन. कांग्रेस विधायक दल के भीतर उनका प्रभाव लगातार बढ़ा था. माना जाता है कि केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर हुई रायशुमारी और आंतरिक मतदान में भी उन्हें बढ़त मिली. सोनिया गांधी और कांग्रेस हाईकमान के सामने यह साफ था कि चुनावी जीत में सिद्दारमैया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. अंततः मुख्यमंत्री पद की बाजी सिद्दारमैया के नाम रही और खरगे एक बार फिर पीछे रह गए.
खरगे को दिल्ली भेजने की रणनीति
2013 का फैसला केवल मुख्यमंत्री चुनने का मामला नहीं था. कांग्रेस नेतृत्व को यह भी पता था कि मल्लिकार्जुन खरगे जैसे वरिष्ठ दलित नेता को पूरी तरह नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है. यही कारण था कि धीरे-धीरे खरगे को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका दी गई. 2014 में वह अपनी कुलबर्गी सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचे. उन्हें लोकसभा में कांग्रेस का नेता बनाया गया. बाद में वे राज्यसभा पहुंचे, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और आज पार्टी संगठन के सर्वोच्च पद पर हैं. एक तरह से कहा जाए तो 2013 में मुख्यमंत्री पद गंवाने वाले खरगे को कांग्रेस ने राष्ट्रीय राजनीति में उससे भी बड़ी भूमिका देकर संतुलन साधने की कोशिश की.
सोनिया गांधी की निर्णायक भूमिका
पूरे घटनाक्रम में सोनिया गांधी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही. सिद्दारमैया को कांग्रेस में लाने से लेकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने तक हर चरण में हाईकमान की मंजूरी निर्णायक रही. सोनिया गांधी ने 2006 में सिद्दारमैया के प्रवेश को केवल एक नेता की भर्ती के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे कर्नाटक में कांग्रेस के सामाजिक विस्तार की रणनीति का हिस्सा बनाया. बाद के वर्षों में जब सिद्दारमैया ने अपनी उपयोगिता साबित कर दी, तब उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का फैसला भी उसी रणनीतिक सोच का परिणाम था. यानी सिद्दारमैया का कांग्रेस में उभार केवल व्यक्तिगत करिश्मे की कहानी नहीं, बल्कि सोनिया गांधी और अहमद पटेल की दीर्घकालिक राजनीतिक योजना की सफलता भी था.
अब विदाई की ओर बढ़ते सिद्दारमैया?
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है. सिद्दारमैया सीएम पद छोड़ चुके हैं. अब सीएम की कुर्सी पर डीके शिवकुमार की ताजपोशी होने जा रही है. हालांकि सिद्दारमैया की लोकप्रियता अब भी बरकरार है, लेकिन पार्टी के भीतर नई पीढ़ी और अन्य नेताओं की दावेदारी भी मजबूत हुई है. सिद्दारमैया को कांग्रेस में आए हुए 20 साल हुए हैं. इस दौरान वह पांच साल तक विपक्ष के नेता और आठ साल तक सीएम रहे हैं. कर्नाटक की राजनीति में सिद्दारमैया का उभार इस बात का उदाहरण है कि सही समय पर लिया गया एक राजनीतिक फैसला किस तरह पूरे सत्ता समीकरण को बदल सकता है. वहीं मल्लिकार्जुन खरगे की कहानी यह दिखाती है कि राजनीति में योग्यता और वरिष्ठता हमेशा सत्ता की गारंटी नहीं होती.