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Jamshedpur Special Pooja: झारखंड में सावन से पहले आषाढ़ी पूजा होती है. यह गांव की सुख-समृद्धि, अच्छी बारिश और फसल के लिए की जाती है. इसमें 7 देवियों और 1 देवता की पूजा होती है. यह यहां की खास परंपरा है जिसे पीढ़ियों से निभाया जा रहा है.
जमशेदपुर. झारखंड की संस्कृति और परंपराएं प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई हैं. यहां के गांवों में आज भी कई ऐसे पर्व मनाए जाते हैं और अनुष्ठान किए जाते हैं, जो लोगों को अपनी जड़ों और पूर्वजों से जोड़कर रखते हैं. इन्हीं परंपराओं में से एक है आषाढ़ी पूजा. सावन माह के आगमन से पहले आयोजित होने वाली यह पूजा गांव की सुख-समृद्धि, शांति, अच्छी बारिश और बेहतर फसल की कामना के लिए की जाती है. ग्रामीण क्षेत्रों में इस पूजा का विशेष महत्व माना जाता है और लोग पूरे उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं.
पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
जमशेदपुर के बर्मामाइंस स्थित रजक समाज के लोगों द्वारा भी हर वर्ष आषाढ़ी पूजा का आयोजन किया जाता है. इस अवसर पर समाज के लोग एकत्र होकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा स्थल को साफ-सुथरा किया जाता है और पूरे श्रद्धाभाव के साथ देवी-देवताओं की आराधना की जाती है. समाज के बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उसी आस्था के साथ निभाई जा रही है.
7 देवियों और 1 देवता की पूजा
गांव के निवासी नेहाल बताते हैं कि आषाढ़ी पूजा में सात देवियों और एक देवता की विशेष पूजा की जाती है. लोगों का विश्वास है कि इन देवी-देवताओं की कृपा से गांव में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है. साथ ही अच्छी वर्षा होने से खेतों में बेहतर खेती होती है और किसानों को अच्छी पैदावार मिलती है. यही कारण है कि खेती-किसानी से जुड़े लोग इस पूजा को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं.
सामाजिक एकता भी मजबूत होती है
इस पूजा की एक खास परंपरा बलि प्रथा भी है, जिसे कुछ समुदाय आज भी अपने रीति-रिवाजों के अनुसार निभाते हैं. ग्रामीणों का मानना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है. हालांकि, पूजा का मुख्य उद्देश्य गांव और समाज की भलाई, प्राकृतिक संतुलन तथा लोगों के जीवन में खुशहाली की कामना करना है. पूजा के दौरान लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर सामूहिक रूप से अनुष्ठान में शामिल होते हैं, जिससे सामाजिक एकता भी मजबूत होती है.
झारखंड की लोक संस्कृति का हिस्सा
आषाढ़ी पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि झारखंड की लोक संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह लोगों को प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जीवन के महत्व का संदेश देती है. बदलते समय के बावजूद गांवों में यह परंपरा आज भी जीवित है और नई पीढ़ी भी इसे आगे बढ़ाने में रुचि दिखा रही है.
ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उनकी संस्कृति और परंपराएं जीवित रहेंगी, तब तक उनकी पहचान भी बनी रहेगी. यही वजह है कि हर साल सावन से पहले आषाढ़ी पूजा के माध्यम से लोग गांव की सुख-समृद्धि, शांति, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और अच्छी फसल की कामना करते हुए इस अनूठी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
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बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें