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दुनिया का छोटा देश, मगर टेक्नोलॉजी में सुपरपावर! क्‍या PM मोदी के...


PM Modi ki Netherlands Yatra Aur Maksad: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज नीदरलैंड हैं. उनका यहां आने का मकसद वही तीन सेक्‍टर्स हैं, जिन पर पूरी दुनिया ने अपना ध्‍यान केंद्रित कर रखा है. ये तीनों सेक्‍टर्स आने वाले समय में न केवल किसी देश की अर्थव्यवस्था, बल्कि उसका भविष्‍य भी तय करेंगे. इनमें पहला है सेमीकंडक्टर यानी चिप्स, दूसरा है वाटर मैनेजमेंट यानी पानी का सही इस्तेमाल और तीसरा है ग्रीन हाइड्रोजन यानी भविष्‍य का साफ ईंधन. आपको बता दें कि आज मोबाइल फोन से लेकर कार, मिसाइल, कंप्यूटर, एआई सिस्टम और अस्पतालों की मशीनों को बनाने में चिप्स की जरूरत पड़ती है.

दूसरी तरफ पानी का संकट दुनिया के कई देशों में लगातार बढ़ता जा रहा है. वहीं पेट्रोल-डीजल और कोयले पर बढ़ती निर्भरता जलवायु के लिए संकट बन चुकी हैं. ऐसे समय में दुनिया की नजर उन देशों पर टिकी है, जिन्होंने इन चुनौतियों का समाधान खोज निकालने में सफलता हासिल की है. इन्‍हीं देशों में यूरोप का एक छोटा सा देश नीदरलैंड भी शामिल है. नीदरलैंड आज इन तीनों सेक्टर्स में दुनिया के लिए रोल मॉडल बन चुका है. यह वही देश है, जिसकी बड़ी आबादी समुद्र तल से नीचे रहती है. सदियों तक बाढ़ और समुद्र के खतरे से जूझने वाले इस देश ने हार नहीं मानी. उसने इंजीनियरिंग, रिसर्च और तकनीक की मदद से अपने लिए नई जमीन तैयार की.

आज यही देश चिप इंडस्ट्री में दुनिया की सबसे अहम कंपनियों में का घर चुका है. पानी बचाने और उसे दोबारा इस्तेमाल करने में इसका कोई मुकाबला नहीं है. ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी नीदरलैंड तेजी से आगे बढ़ रहा है. वहीं, दूसरी तरफ भारत है, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. भारत में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन चिप्स के लिए अभी भी विदेशी देशों पर निर्भरता बनी हुई है. पानी का संकट लगातार गंभीर हो रहा है. कई शहरों और गांवों में भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है. इसके अलावा भारत अभी भी बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम प्रोडक्‍ट्स को आयात करता है.

ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह भविष्य की जरूरतों के हिसाब से खुद को तैयार करे. यहीं पर नीदरलैंड का मॉडल भारत के लिए जरूरी हो जाता है. भारत अगर डच टेक्नोलॉजी, उनके वॉटर मैनेजमेंट सिस्टम और ग्रीन हाइड्रोजन पॉलिसी से सीख लेता है, तो आने वाले समय में बड़ा बदलाव संभव है. आपको बता दें कि यह बदलाव न सिर्फ हमारी तकनीकी आत्‍मनि‍भरता को बेहतर करेगा, बल्कि रोजगार, उद्योग, ऊर्जा सुरक्षा और आम लोगों की जिंदगी सुधारने में भी मददगार साबित होगा. आइए समझते हैं कि नीदरलैंड ने इन क्षेत्रों में कैसे सफलता हासिल की, भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और दोनों देश मिलकर कैसे आगे बढ़ सकते हैं.

सेमीकंडक्टर को लेकर नीदरलैंड का सफर

  1. शुरुआत से मजबूत बुनियाद तक: नीदरलैंड में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की शुरुआत 1970 और 1980 के दशक में हुई. उस समय कंपनी फिलिप्स इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में तेजी से आगे बढ़ रही थी. फिलिप्स ने सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि चिप टेक्नोलॉजी की गहराई को समझा. ईंडहोवन शहर धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी हब बन गया. यहीं से एएसएमएल (ASML) जैसी कंपनी अस्तित्‍व में आईं. दुनिया की कई कंपनियां चिप्स बनाना चाहती थीं, लेकिन एएसएमएल ने अलग रास्ता चुना. उसने चिप्स बनाने वाली मशीनें बनानी शुरू कीं. यह रणनीति बेहद सफल रही. आज दुनिया की सबसे आधुनिक चिप मशीनें एएसएमएल बनाती है.
  2. रिसर्च और एजुकेशन में भारी इन्वेस्टमेंट: नीदरलैंड ने इंडस्‍ट्री के साथ रिसर्च और शिक्षा को भी अहमियत दी. डच सरकार ने यूनिवर्सिटीज और प्राइवेट कंपनियों के बीच मजबूत साझेदारी बनाई. स्टूडेंट्स को रिसर्च प्रोजेक्ट्स और इंटर्नशिप से जोड़ा गया. यूनिवर्सिटीज को आधुनिक लैब बनाने के लिए फंड दिया गया. इसका फायदा यह हुआ कि देश में स्किल्ड इंजीनियर और साइंटिस्‍ट तैयार हुए. धीरे-धीरे नीदरलैंड ने चिप डिजाइन, मशीन डेवलपमेंट और सप्लाई चेन मैनेजमेंट में महारत हासिल कर ली. आज यह छोटा देश सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की पूरी वैल्यू चेन में अहम भूमिका निभाता है. रिसर्च में लगातार निवेश ने इसे बाकी देशों से आगे कर दिया.
  3. ग्लोबल पार्टनरशिप का मिला फायदा: नीदरलैंड ने कभी खुद को अकेला नहीं रखा. उसने जर्मनी, बेल्जियम और अमेरिका जैसे देशों के साथ मिलकर काम किया. यूरोप में कई रिसर्च सेंटर बनाए गए, जहां दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां नए प्रयोग करती हैं. आईएमसीई (IMEC) जैसी लैब इसका बेहतरीन उदाहरण है. डच सरकार ने खुली अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई. विदेशी कंपनियों को निवेश और रिसर्च के लिए प्रोत्साहित किया गया. इससे देश को नई तकनीक, एक्सपर्ट और बाजार मिला. यह मॉडल इसलिए सफल हुआ क्योंकि उन्होंने सहयोग को प्रतियोगिता से ज्यादा महत्व दिया.
  4. लगाईं गईं एडवांस फैक्ट्रियां: चिप्स बनाने का प्रॉसेस की प्रॉसेस बेहद सेंसिटिव होता है. इसमें धूल का छोटा सा कण भी नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए नीदरलैंड ने क्लीन रूम टेक्नोलॉजी पर खास ध्यान दिया. उनकी फैक्ट्रियां इतनी साफ होती हैं कि वहां हवा भी फिल्टर होकर जाती है. इसके साथ ही डच कंपनियों ने बिजली और पानी की खपत कम करने वाली तकनीक विकसित की. कम जगह में ज्यादा प्रोडक्‍शन करने वाली फैक्ट्रियां बनाई गईं. यही कारण है कि आज दुनिया की सबसे महंगी और एडवांस चिप मशीनें यहीं बनती हैं.
  5. शुरू कर दी है भविष्य की तैयारी: नीदरलैंड अब सिर्फ मौजूदा तकनीक तक सीमित नहीं है. वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और अगली पीढ़ी की चिप्स पर काम कर रहा है. सरकार और प्राइवेट कंपनियां मिलकर अरबों यूरो का निवेश कर रही हैं. उनका लक्ष्य यूरोप को चिप्स के मामले में आत्मनिर्भर बनाना है. चीन और अमेरिका पर निर्भरता कम करना उनकी बड़ी रणनीति का हिस्सा है. नीदरलैंड ने साबित किया है कि छोटा देश होने के बावजूद अगर रणनीति सही हो, तो वैश्विक स्तर पर नेतृत्व किया जा सकता है.

वाटर मैनेजमेंट के सेक्‍टर में नीदरलैंड का सफर

  1. नीदरलैंड ने समुद्र से कर ली लड़ाई: नीदरलैंड का बड़ा हिस्सा समुद्र तल से नीचे है. इसलिए यहां बाढ़ हमेशा से बड़ी समस्या रही. 1953 में आई भयानक बाढ़ ने हजारों लोगों की जान ले ली. इसके बाद डच सरकार ने फैसला किया कि अब सिर्फ इंतजार नहीं किया जाएगा, बल्कि मजबूत सिस्टम बनाया जाएगा. देशभर में डैम और डाइक बनाए गए. समुद्र के पानी को रोकने के लिए बड़े-बड़े बैरियर लगाए गए. यह नीदरलैंड के वॉटर मैनेजमेंट मॉडल की शुरुआत थी. उन्होंने पानी को कंट्रोल करने की तकनीक पर लगातार काम किया.
  2. डेल्टा वर्क्स की प्रोजेक्‍ट ने बदली दिशा: नीदरलैंड का डेल्टा वर्क्स प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे बड़े फ्लड कंट्रोल सिस्टम में गिना जाता है. इसमें नदियों और समुद्र के बीच विशाल बैरियर बनाए गए. जरूरत पड़ने पर ये बंद हो जाते हैं और समुद्र का पानी अंदर आने से रोकते हैं. इस सिस्टम की खास बात यह है कि जहाजों की आवाजाही भी जारी रहती है. इंजीनियरिंग और तकनीक का यह शानदार उदाहरण पूरी दुनिया के लिए नजीर बन चुका है. कई देश अब नीदरलैंड के डेल्टा वर्क्स मॉडल से सीख का अपने वॉटर मैनेजमेंट सिस्‍टम को बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं.
  3. नीदरलैंड ने पानी से कर ली दोस्‍ती: पहले नीदरलैंड सिर्फ बांध बनाकर पानी रोकने की कोशिश करता था. लेकिन बाद में उन्होंने सोच बदली. उन्होंने ‘रूम फॉर द रिवर’ प्रोजेक्ट शुरू किया. इसका मतलब था कि नदियों को बहने के लिए ज्यादा जगह दी जाए. नदी के किनारों पर पार्क, छोटे चैनल और खुले इलाके बनाए गए ताकि बाढ़ का पानी आसानी से फैल सके. इससे शहरों को नुकसान कम हुआ. यह मॉडल पर्यावरण के अनुकूल भी है, क्योंकि इसमें प्रकृति के साथ मिलकर काम किया जाता है.
  4. मीठे पानी को बचाने की तकनीक: समुद्र के पास होने के कारण नीदरलैंड में मीठे पानी की कमी भी बड़ी चुनौती रही. इसे देखते हुए उन्होंने बारिश के पानी को स्टोर करने की तकनीक विकसित की. भूमिगत जल भंडारण सिस्टम बनाए गए. सर्दियों में जमा पानी को गर्मियों में खेती और उद्योगों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा. स्मार्ट सेंसर लगाए गए जो हर बूंद का हिसाब रखते हैं. यही तकनीक आज दुनिया के कई देशों को बेची जा रही है.
  5. गंदे पानी से ब‍िजली बनाना: नीदरलैंड ने वेस्टवाटर मैनेजमेंट में भी कमाल किया है. वहां गंदे पानी को साफ करके दोबारा इस्तेमाल किया जाता है. कई ट्रीटमेंट प्लांट ऐसे हैं जो पानी साफ करने के साथ बिजली भी पैदा करते हैं. कीचड़ और जैविक कचरे से भी बिजली बनाई जाती है. कई प्लांट ‘एनर्जी पॉजिटिव’ बन चुके हैं. यानी जितनी बिजली खर्च होती है, उससे ज्यादा पैदा होती है. यह मॉडल भारत जैसे देशों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है.

ग्रीन हाइड्रोजन के सेक्‍टर में नीदरलैंड का सफर

  1. पेट्रोल से हाइड्रोजन की तरफ बढ़ाए कदम: नीदरलैंड लंबे समय तक गैस और पेट्रोलियम का बड़ा सेंटर रहा है. लेकिन जलवायु परिवर्तन के खतरे को देखते हुए उसने ग्रीन हाइड्रोजन पर काम शुरू किया. 2015 के बाद इस दिशा में तेजी आई. नीदरलैंड ने पुरानी गैस पाइपलाइनों को हाइड्रोजन के लिए इस्तेमाल करने की योजना बनाई. इससे लागत कम हुई और पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग भी हो गया. यह सोच बेहद व्यावहारिक साबित हुई.
  2. रॉटरडैम बना हाइड्रोजन हब: रॉटरडैम दुनिया की सबसे बड़ी बंदरगाहों में से एक है. अब इसे ग्रीन हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित किया जा रहा है. यहां बड़े स्तर पर हाइड्रोजन स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं. समुद्र में लगे विंड टर्बाइन बिजली बनाते हैं. इसी बिजली का इस्‍तेमाल कर पानी से हाइड्रोजन तैयार की जाती है. यह पूरा प्रॉसेस क्‍लीन एनर्जी पर आधारित है.
  3. बड़ी कंपनियों के साथ साझेदारी: शेल जैसी बड़ी कंपनियों ने डच सरकार के साथ मिलकर नॉर्दर्न हाइड्रोजन वैली प्रोजेक्ट शुरू किया. यह यूरोप का सबसे बड़ा हाइड्रोजन प्रोजेक्ट माना जाता है. सरकार ने सब्सिडी दी और निजी कंपनियों ने निवेश किया. इससे हजारों नौकरियां पैदा हुईं.
  4. आम जीवन में हाइड्रोजन की इंट्री: नीदरलैंड ने सिर्फ इंडस्‍ट्री के लिए ही नहीं, बल्कि आम जीवन के लिए भी हाइड्रोजन का इस्तेमाल शुरू किया. हाइड्रोजन से चलने वाली बसें और ट्रक सड़कों पर उतारे गए. कुछ इलाकों में घरों की पुरानी गैस पाइपलाइन को हाइड्रोजन सप्लाई के लिए बदला गया. इससे प्रदूषण कम हुआ और इंपोर्टेड फ्यूल पर निर्भरता भी घट गई.
  5. अब निर्यातक बनने की तैयारी: अब नीदरलैंड ग्रीन हाइड्रोजन को एक्सपोर्ट प्रोडक्ट बनाना चाहता है. उसका लक्ष्य पूरे यूरोप को हाइड्रोजन सप्लाई करना है. इसके लिए नई पाइपलाइन और स्टोरेज नेटवर्क तैयार किए जा रहे हैं. यह रणनीति उसे भविष्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था में बड़ी ताकत बना सकती है.

भारत की जरूरतों को पूरा कर सकता है नीदरलैंड

  1. सेमीकंडक्टर में भारत आत्मनिर्भरता: भारत में मोबाइल, लैपटॉप, कार और रक्षा उपकरणों की मांग तेजी से बढ़ रही है. लेकिन चिप्स के लिए अभी भी विदेशी देशों पर निर्भरता बनी हुई है. कोविड के दौरान जब सप्लाई चेन टूटी, तब भारत को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा. इसलिए अब जरूरी है कि भारत अपनी सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियां लगाए और डिजाइनिंग सेक्टर को मजबूत करे. एएसएमएल जैसी कंपनी भारत को आधुनिक चिप मशीनें और टेक्निकल सपोर्ट दे सकती है. इससे भारत अपनी चिप इंडस्ट्री को तेजी से डेवलप कर सकता है.
  2. पानी का सही इस्तेमाल: भारत में कई शहर और गांव पानी की कमी से जूझ रहे हैं. भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है. गंदा पानी बिना साफ किए नदियों में छोड़ा जा रहा है. भारत को पानी के दोबारा इस्तेमाल को लेकर काम कर रहा है. बारिश के पानी को स्टोर करने और वेस्टवाटर ट्रीटमेंट सिस्टम को मजबूत करने की भी कोशिश की जा रही हैं. डच कंपनियां भारत के शहरों में आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने में मदद कर सकती हैं. इससे गंदे पानी को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकेगा.
  3. ग्रीन हाइड्रोजन की ओर कदम: भारत दुनिया के बड़े पॉवर कंज्‍यूमर्स में शामिल है. कोयले और पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने के लिए भारत भी ग्रीन हाइड्रोजन पर काम कर रहा है. नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन इस दिशा में बड़ा कदम है. लेकिन इसे जमीन पर लागू करने के लिए बड़े निवेश और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की अभी भी जरूरत है. नीदरलैंड और भारत मिलकर ग्रीन हाइड्रोजन कॉरिडोर बना सकते हैं. इससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग बढ़ने से कई समस्‍याएं अपने आप ही सुलझ जाएंगे.
  4. शहरों में फ्लड मैनेजमेंट: हर साल बारिश के दौरान मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में बाढ़ की समस्या सामने आती है. पुराना ड्रेनेज सिस्टम अब काम नहीं कर पा रहे हैं. भारत को ऐसे शहर विकसित करने की कोशिश में है, जहां सड़कें, पार्क और खुले क्षेत्र पानी को सोख सकें. इसी प्‍लानिंग का नतीजा केंद्र सरकार की स्‍मार्ट सिटी योजना है. डच मॉडल के फ्लोटिंग फार्म और वाटर प्लाजा भारतीय शहरों के लिए उपयोगी हो सकते हैं. इससे बाढ़ और पानी की समस्या कम हो सकती है.
  5. चिप्स फैक्ट्री के लिए रिसोर्सेज: सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियों को भारी मात्रा में पानी और बिजली चाहिए. भारत में कई जगह बिजली और पानी की समस्या है. इसलिए चिप इंडस्ट्री के साथ वॉटर रीसाइक्लिंग और मजबूत पावर ग्रिड तैयार करने की तरफ भारत आगे बढ़ रहा है. दोनों देश मिलकर इंजीनियरिंग और रिसर्च प्रोग्राम शुरू करने की तरफ बढ़ रहे हैं. इससे भारत को स्किल्ड मैनपावर मिल सकेगी.

क्या सिर्फ नीदरलैंड से मदद लेने से भारत की समस्याएं खत्म हो जाएंगी?
नहीं. नीदरलैंड तकनीक और अनुभव दे सकता है, लेकिन भारत को अपने हालात के हिसाब से बदलाव करने होंगे. भारत का मौसम, आबादी और जरूरतें अलग हैं. इसलिए डच मॉडल को भारतीय जरूरतों के हिसाब से ढालना जरूरी होगा.

क्या ग्रीन हाइड्रोजन बहुत महंगा है?
फिलहाल इसकी लागत ज्यादा है. लेकिन जैसे-जैसे सोलर और विंड एनर्जी सस्ती होगी, वैसे-वैसे ग्रीन हाइड्रोजन भी किफायती हो जाएगी.

चिप फैक्ट्री लगाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सबसे बड़ी चुनौती अल्ट्रा प्योर पानी और लगातार बिजली की सप्लाई है. इसके अलावा स्किल्ड वर्कफोर्स और मेंटेनेंस भी जरूरी है.

क्या डच मॉडल भारतीय गांवों में काम करेगा?
काफी हद तक हां. छोटे जल भंडारण और रिचार्ज सिस्टम गांवों में उपयोगी हो सकते हैं. लेकिन इसके लिए पंचायत स्तर पर मजबूत व्यवस्था चाहिए होगी.



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