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मरणोपरांत शिबू सोरेन को मिलेगा देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मानः अबुआ राज की नींव रखने वाले शिबू की विरासत को देश का नमन झारखंड राज्य गठन के महानायक और आदिवासियों के हक-अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले स्व. दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मंगलवार को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्य भूषण’ से नवाजा जाएगा। राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू यह सम्मान प्रदान करेंगी। गुरुजी को यह सम्मान मरणोपरांत लोक कल्याण और आदिवासी समाज के सशक्तीकरण के लिए उनके ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए दिया जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसी वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इसकी घोषणा की थी। गौरतलब है कि लंबी बीमारी के बाद पिछले साल 4 अगस्त 2025 को शिबू सोरेन का निधन हो गया था। निधन के समय वे राज्यसभा सांसद थे। इससे पहले झारखंड विधानसभा से उन्हें ‘भारत रत्न’ देने का प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित कर केंद्र को भेजा गया था। इस गौरवमयी पल का साक्षी बनने के लिए शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन और उनकी पुत्रवधू कल्पना सोरेन सोमवार को दिल्ली के लिए रवाना हो गईं। झामुमो के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने बताया कि राष्ट्रपति के हाथों यह सम्मान रूपी सोरेन ग्रहण करेंगी। सिर्फ राजनीति नहीं, शिबू सोरेन का पूरा जीवन समाज सुधार की एक पाठशाला था। लगातार 8 बार लोकसभा सांसद और संप्रग (य) सरकार में कोयला मंत्री रहे शिबू सोरेन ने जिन 5 संकल्पों पर आदिवासियों को एकजुट किया, उसने राज्य की सियासत और सामाजिक ताने-बाने को हमेशा के लिए बदल दिया। आंदोलन से बदलाव तक… गुरुजी का झारखंड मॉडल
1. नशाबंदी: ‘हड़िया-दारू’ को बताया बड़ा दुश्मन
सोच: गुरुजी नशाखोरी के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने नारा दिया कि नशा गरीबों और आदिवासियों के लिए अभिशाप है। इसके कारण महाजन और साहूकार उनकी जमीनों पर कब्जा कर लेते हैं। उन्होंने पूरे राज्य में नशाबंदी अभियान चलाया, जहां शराब बनाने और बेचने वालों पर सख्त कार्रवाई होती थी।
बदलाव (फूलो-झानो योजना): 27 अगस्त 2008 को जब वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, तो पहली ही कैबिनेट में महिलाओं को हड़िया-दारू के धंधे से मुक्त कर वैकल्पिक रोजगार देने की पहल की। यही सोच बाद में ‘फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान’ (शुरुआत 20 सितंबर 2020, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा) की नींव बनी। इस योजना से अब तक 36,000 ग्रामीण महिलाएं ब्याज-मुक्त लोन और ‘पलाश ब्रांड’ के जरिए स्वरोजगार से जुड़ चुकी हैं। 2. शिक्षा: रात्रि पाठशाला से आदिवासी बने साक्षर
सोच: गुरुजी शिक्षा के अभाव को ही पिछड़ेपन की सबसे बड़ी वजह मानते थे। वे चाहते थे कि आदिवासी शिक्षा व विकास के मुख्यधारा में शामिल हों।
प्रयोग: उन्होंने धनबाद के शिवलाल मुर्मू के घर से ‘चलो पढ़ो रात्रि पाठशाला’ की शुरुआत की। वे खुद रात में आदिवासियों को पढ़ाने बैठते थे और पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें शराब के नुकसान समझाते थे। इसी अभियान ने उन्हें संथाल आदिवासियों का गुरुजी बना दिया।
3. अबुआ राज: दमन-शोषण को दी चुनौती
लड़ाई: गुरुजी ने आदिवासियों के सांस्कृतिक दमन, जमीन हड़पने और शोषण के खिलाफ बिगुल फूंका। उनका मानना था कि आदिवासियों का प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक होना चाहिए। इसी से अबुआ राज (हमारा राज) का विचार पैदा हुआ। -शेष पेज 11 पर
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