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Ramayan Saar In 27 Words: कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है और समय-समय पर साहित्यकारों ने अपनी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता से इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. महर्षि वाल्मीकि से लेकर गोस्वामी तुलसीदास तक, रामायण की रचना अलग-अलग भाषाओं, शैलियों और स्वरूपों में की गई है. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए झारखंड के पलामू जिले के साहित्यकार शिव कुमार ने रामायण को एक अनोखी और कलात्मक शैली में प्रस्तुत किया है. उनकी यह रचना न केवल साहित्य प्रेमियों को आकर्षित कर रही है, बल्कि अपनी विशिष्टता के कारण चर्चा का विषय भी बनी हुई है.
पलामू जिले के रहने वाले शिव कुमार वर्षों से साहित्य सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हैं और अपनी अलग शैली के लिए पहचाने जाते हैं. उनकी रचनात्मक प्रतिभा का सम्मान दो बार इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स से भी किया जा चुका है. इस बार उन्होंने रामायण का सार ऐसी शैली में लिखा है, जिसे उन्होंने ‘संपूर्ण वर्णमाला शैली’ नाम दिया है.
इस शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें हिंदी की पूरी वर्णमाला का इस्तेमाल करते हुए मात्र 27 शब्दों और 80 अक्षरों में संपूर्ण रामायण का सार प्रस्तुत किया गया है. उन्होंने कहा कि इस अनूठी रचना में स्वर वर्ण, व्यंजन वर्ण और संयुक्त व्यंजन सहित हिंदी वर्णमाला के सभी 50 वर्णों को समाहित किया गया है.
इतने सीमित शब्दों और अक्षरों में भगवान श्रीराम के जीवन, उनके आदर्श, संघर्ष, मर्यादा और संपूर्ण रामायण की कथा का सार समेटना अपने आप में एक कठिन और रचनात्मक कार्य माना जा रहा है. यही कारण है कि उनकी यह प्रस्तुति साहित्य जगत में विशेष पहचान बना रही है.
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शिव कुमार पांडे ने लोकल18 को बताया कि साहित्य उनके लिए केवल लेखन नहीं, बल्कि साधना और अभिव्यक्ति का माध्यम है. नई-नई विधाओं और शैलियों में लिखना उनकी रुचि और पहचान दोनों है. उन्होंने बताया कि इस ‘साहित्य सार’ को तैयार करने में लगभग तीन दिनों का समय लगा.
इस दौरान उन्होंने कई बार शब्दों का चयन और क्रम बदला, ताकि संपूर्ण रामायण का भाव कम से कम शब्दों में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया जा सके. उनके अनुसार इस रचना में भगवान श्रीराम के चरित्र, आदर्श, धर्म, त्याग और मर्यादा का सार समाहित है.
पलामू की इस अनूठी साहित्यिक उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर की मोहताज नहीं होती. सीमित संसाधनों के बीच भी अगर सोच रचनात्मक हो, तो साहित्य में नए प्रयोग संभव हैं. शिव कुमार की यह वर्णमाला शैली न केवल उनकी सृजनशीलता का प्रमाण है, बल्कि यह पलामू की साहित्यिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.