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पलामू फिर बनेगा ‘बाघों की धरती’, साल के अंत तक आएंगे 2...


पलामू.  झारखंड राज्य प्राकृतिक संसाधनों और धरोहरों से परिपूर्ण है. इसी क्रम में पलामू टाइगर रिजर्व कभी देश में बाघों की समृद्ध आबादी के लिए जाना जाता था. एक समय ऐसा था, जब अविभाजित बिहार के 85 बाघों में से 41 केवल पलामू के जंगलों में पाए जाते थे. अंग्रेजी शासन और राजशाही दौर में यह इलाका बाघों के शिकार का बड़ा केंद्र बन गया. पलामू गजट, सैंडर्स रिपोर्ट और वन विभाग के पुराने दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1898 में अंग्रेजी सरकार बाघ के शिकार पर 25 रुपये का इनाम देती थी. वहीं लात, रामगढ़ और रूद जैसे क्षेत्रों को ‘शूटिंग ब्लॉक’ के रूप में चिन्हित किया गया था, जहां लाइसेंस लेकर शिकार किया जाता था.

बहुत महंगी बिकती थी खाल
एक्सपर्ट डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव ने लोकल 18 को बताया कि 1968 में पूरे देश में अंतिम बार शिकार के लाइसेंस जारी हुए और उसी दौर में बाघ की खाल 3000 रुपये तथा तेंदुए की खाल 1400 रुपये तक बिकती थी. इसके बाद वन्यजीव संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ी और बाघों के शिकार पर रोक लगा दी गई. हालांकि, 90 के दशक में नक्सली हिंसा के दौरान वन विभाग के कई भवन नष्ट होने से शिकार से जुड़े अनेक ऐतिहासिक दस्तावेज भी खत्म हो गए.

फिर लौटेगी बाघों की दहाड़
यही वजह है कि पलामू आज फिर से बाघों की दहाड़ लौटाने की तैयारी में जुटा है. केंद्र सरकार ने पलामू टाइगर रिजर्व में बाघ पुनर्वास (टाइगर रिइंट्रोडक्शन) कार्यक्रम को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत वर्ष के अंत तक दो बाघिन और एक बाघ को दूसरे टाइगर रिजर्व से लाकर यहां बसाने की योजना है. अधिकारियों का लक्ष्य अगले 10 वर्षों में पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या 15 से अधिक पहुंचाना है. बता दें कि वर्ष 2023 के बाद से कई बार बाघों की मूवमेंट दर्ज हुई है और सात बाघों के पगमार्क तथा तीन बाघों की प्रत्यक्ष साइटिंग भी रिकॉर्ड की गई है, लेकिन कोई भी बाघ स्थायी रूप से यहां नहीं रुका. इसी कारण वैज्ञानिक तरीके से पुनर्वास कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है, ताकि यहां स्थायी बाघ आबादी विकसित हो सके.

जनभागीदारी का अभियान
डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जैना ने लोकल 18 को बताया कि बाघ संरक्षण को केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसे जनभागीदारी का अभियान बनाया जा रहा है. पलामू टाइगर रिजर्व के लगभग 200 गांवों में रहने वाले आदिवासी समुदाय, स्कूली बच्चों और महिलाओं को संरक्षण अभियान से जोड़ा जा रहा है. महिलाओं का एक विशेष समूह ‘बाघ दीदी’ बनाया गया है, जो ग्रामीणों को वन और वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करने, शिकार रोकने और स्वरोजगार से जोड़ने का काम कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर बेतला में विशेष कार्यक्रम आयोजित कर बच्चों और ग्रामीण महिलाओं को संरक्षण का संदेश दिया जाता है. जंगल के आसपास रहने वाले लोग प्रकृति और जैव विविधता को सबसे बेहतर समझते हैं, इसलिए उनकी भागीदारी से संरक्षण अभियान अधिक प्रभावी होगा.

इतिहास की बात
पलामू टाइगर रिजर्व के इतिहास की बात करें तो देश के वन्यजीव संरक्षण आंदोलन में इसका विशेष स्थान रहा है. वर्ष 1973 में देश के पहले नौ टाइगर रिजर्व में पलामू को शामिल किया गया था और प्रोजेक्ट टाइगर से जुड़ी पहली बैठक भी यहीं आयोजित हुई थी. इससे पहले वर्ष 1968-69 में विश्व प्रकृति कोष (WWF) की प्रतिनिधि ऐन राइट ने पलामू का दौरा किया था और बाघ संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की थी. अंग्रेजों के समय 1932 में भारत में पहली बार बाघों की गणना पदचिह्न (पगमार्क) के आधार पर पलामू से ही शुरू हुई थी. यही ऐतिहासिक विरासत आज फिर पलामू को बाघ संरक्षण के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में प्रेरित कर रही है.

वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव ने लोकल 18 को बताया कि बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि पूरे जंगल के स्वास्थ्य का प्रतीक है. बाघों की संख्या बढ़ने से जंगलों की जैव विविधता मजबूत होगी, पर्यावरण संतुलित रहेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नया सहारा मिलेगा. इको-टूरिज्म, इको-गाइड, होम-स्टे, हस्तशिल्प, परिवहन और अन्य स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ेंगे.

अगर सफल होती है योजना
पलामू टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक प्रजेश कांत जैना ने बताया कि पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरे लैंडस्केप को वन्यजीवों का मजबूत आवास बनाना, जैव विविधता का संरक्षण करना और स्थानीय संस्कृति तथा अर्थव्यवस्था को नई गति देना है. अगर यह योजना सफल होती है, तो कभी बाघों की धरती कहलाने वाला पलामू एक बार फिर देश के प्रमुख टाइगर लैंडस्केप के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर सकता है.



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