भारतन्यूज़ – टॉप हेडर
News Menu Bar

पलामू में यहां सोन की धारा में बिराजते हैं दशशीशानाथ महादेव, त्रेतायुग...


पलामू में यहां नदी के बीच विराजते हैं दशशीशानाथ महादेव, त्रेतायुग से जुड़ी है कहानी

पलामूः सावन का पावन महीना आते ही शिवालयों में हर-हर महादेव के जयकारे गूंजने लगते हैं. पलामू में एक ऐसा भी प्राचीन शिवधाम है, जहां भगवान शिव नदी की धारा के बीच विराजमान हैं. बिहार और झारखंड की सीमा पर सोन नदी के बीच स्थित दशशीशानाथ महादेव मंदिर आस्था के साथ-साथ रहस्य और प्राचीन मान्यताओं के लिए भी खास पहचान रखता है. बता दे कि सावन में यहां दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं और नाव या पानी के रास्ते शिवलिंग का दर्शन कर जलाभिषेक करते है.

रावण ने यहां स्थापित किया था शिवलिंग
स्थानीय मान्यता के अनुसार यह शिव स्थल त्रेतायुग की उस कथा से जुड़ा है, जब लंकापति रावण भगवान शिव को प्रसन्न कर एक शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था. रास्ते में सोन नदी के इलाके में रावण को लघुशंका लगी. मान्यता है कि उसने एक स्थानीय चरवाहे को शिवलिंग सौंपकर थोड़ी देर के लिए रखने को कहा. चरवाहे ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया. वापस लौटने पर रावण ने शिवलिंग को उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिला. इसके बाद से भगवान शिव यहीं विराजमान माने जाते हैं.

क्यों पड़ा दशशीशानाथ नाम?
स्थानीय लोगों ने बताया कि दशशीशानाथ महादेव के नाम के पीछे मान्यता लंकापति रावण से जुड़ी है. रावण दस सिर वाला था और वह भगवान शिव का परम भक्त माना जाता था. रावण द्वारा यहां शिवलिंग स्थापित किए जाने के कारण इसका नाम दशशीशानाथ पड़ा. वहीं भगवान शिव को भोलेनाथ और सबके नाथ कहा जाता है, इसलिए रावण के दस शीश और शिव के नाथ स्वरूप से जुड़कर यह स्थान दशशीशानाथ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

सोन की धारा के बीच शिवलिंग, आस्था का अनोखा केंद्र
दशशीशानाथ महादेव की सबसे खास बात यह है कि शिवलिंग सोन नदी की धारा के बीच स्थित है. यहां कोयल, सरस्वती और सनहा नदियों की धाराओं का मिलन होता है और आगे ये सोन नदी में समाहित हो जाती हैं. नदी के बीच स्थित शिवलिंग का दर्शन अपने आप में श्रद्धालुओं के लिए अनोखा अनुभव है. सावन में जब चारों ओर पानी और हरियाली होती है, तब इस स्थान का प्राकृतिक दृश्य और भी आकर्षक हो जाता है.

मान्यता, गंगा करती हैं शिवलिंग का जलाभिषेक
स्थानीय लोगों ने बताया कि इस साल भारी बारिश के कारण नदी उफान पर है. शिवलिंग को लेकर यहां कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं. हर वर्ष के कई महीनों में नदी का जल शिवलिंग को अपने भीतर समेटे रहता है, जबकि पानी कम होने पर श्रद्धालुओं को इसके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं. मान्यता है कि नदी का जल भगवान शिव का निरंतर अभिषेक करता है. श्रद्धालुओं की आस्था है कि प्राकृतिक परिस्थितियां कैसी भी हों, महादेव अपने स्थान पर अडिग रहते हैं.

शिलालेखों में दर्ज है इतिहास
दशशीशानाथ महादेव केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन इतिहास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है. मंदिर परिसर और आसपास अलग-अलग कालखंडों से जुड़े शिलालेख मिलने की बात कही जाती है. बता दें कि खरवार राजा प्रताप धवल देव की वंशावली से संबंधित लेख भी यहां मौजूद हैं. अलग-अलग समय में यहां आने वाले शासकों और श्रद्धालुओं द्वारा पूजा-अर्चना किए जाने के प्रमाण इस स्थल की प्राचीनता की ओर संकेत करते हैं.

सावन में उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब
बता दें कि सावन और महाशिवरात्रि के दौरान दशशीशानाथ महादेव के दर्शन के लिए बिहार और झारखंड के विभिन्न इलाकों से श्रद्धालु पहुंचते हैं. कोई नाव के सहारे नदी के बीच तक जाता है तो कोई पानी में उतरकर बाबा का दर्शन करता है. भक्त यहां मन्नत मांगते हैं और पूरी होने पर दोबारा बाबा के दरबार में पहुंचते हैं. स्थानीय निवासी लक्ष्मण चौधरी, कबरा कला, बताते हैं कि यह बेहद पुराना धार्मिक स्थल है, जहां अलग-अलग लिपियों में लिखे प्राचीन साक्ष्य देखने को मिलते हैं. लोगों की गहरी आस्था है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है.



Source link

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top