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बिल्ली से दूध की रखवाली कराने चला तुर्की! पाकिस्तान को साथ लेकर...


नई दिल्ली: वेस्ट एशिया में पहले से ही भारी टेंशन का माहौल है. इस बीच सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की के साथ एक रक्षा समझौता किया है. इसे मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट नाम दिया गया है. तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया है. उन्होंने कहा कि यह आतंकवाद से लड़ने में मदद करेगा. यह काफी हैरान करने वाला बयान है. पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्ट्री है. अब एर्दोगन उसी पाकिस्तान के साथ मिलकर आतंकवाद का सफाया करने की बात कर रहे हैं. इस त्रिकोणीय समझौते ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. वहीं ईरान इस नए गठबंधन से बुरी तरह भड़क गया है. ईरान ने सऊदी अरब को चेतावनी देते हुए इसे सिर्फ एक कागज का टुकड़ा करार दिया है.

क्या है मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट और क्यों हो रही इसकी इतनी ज्यादा चर्चा?

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने तुर्की और पाकिस्तान के नेताओं की मेजबानी की. मक्का में तीनों देशों के बीच यह बड़ा डिफेंस एग्रीमेंट साइन हुआ है. इसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ असीम मुनीर भी शामिल हुए. इस समझौते की सबसे बड़ी शर्त नाटो की तर्ज पर आधारित है. अगर इन तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है. तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.

मक्का में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने साइन किया एग्रीमेंट. (Reuters Photo)

यह एग्रीमेंट तीनों देशों के बीच सैन्य सहयोग और इंटेलिजेंस शेयरिंग को काफी मजबूत करेगा. सऊदी अरब के पास बहुत पैसा और तेल है. पाकिस्तान एक न्यूक्लियर पावर वाला देश है. वहीं तुर्की के पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी आर्मी है. इन तीनों का साथ आना एक बड़ा जियोपोलिटिकल शिफ्ट माना जा रहा है.

क्या आतंकवाद के सबसे बड़े पनाहगार के साथ दुनिया से आतंक मिटा पाएंगे एर्दोगन?

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने कहा कि यह समझौता कलेक्टिव डिटरेंस पर आधारित है. इससे डिफेंस इंडस्ट्री में जॉइंट प्रोजेक्ट डेवलप करने में बड़ी मदद मिलेगी. एर्दोगन ने यह भी कहा कि इससे आतंकवाद से लड़ने में बड़ी सफलता मिलेगी. उनका यह बयान बड़ा अजीब लग रहा है. पाकिस्तान की विदेश नीति हमेशा से आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली रही है. खुद पाकिस्तान पूरी दुनिया में आतंकियों को पनाह देने के लिए बदनाम है. अब एर्दोगन उसी देश के साथ मिलकर आतंक से लड़ने का दावा कर रहे हैं. तुर्की खुद को एक ग्लोबल मुस्लिम लीडर के रूप में प्रोजेक्ट करना चाहता है. इसलिए वह पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ अपनी दोस्ती को लगातार गहरा कर रहा है.

ईरान ने नए रक्षा समझौते पर क्यों दी है सऊदी अरब को सीधी और खुली चेतावनी?

इस नए डिफेंस एग्रीमेंट से ईरान बिल्कुल भी खुश नहीं है. ईरान की संसद और नेशनल सिक्योरिटी कमीशन के मेंबर इब्राहिम रेजाई ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने इस समझौते को महज एक कागज का टुकड़ा बता दिया है. रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपना गुस्सा जाहिर किया.

उन्होंने लिखा, ‘सऊदी अरब को यह समझना चाहिए कि तुर्की और पाकिस्तान के साथ किए गए कागजी समझौते से उन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी’. उन्होंने आगे कहा कि सालों तक अमेरिका की गुलामी करने के बाद भी सऊदी सुरक्षित नहीं हुआ. अगर सऊदी अरब अपनी नीतियां सुधार ले तो उसे दूसरों से सुरक्षा की भीख नहीं मांगनी पड़ेगी. ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से कोल्ड वॉर और भारी तनाव चल रहा है.

आखिर क्यों सऊदी अरब को दूसरे देशों से बार-बार मांगनी पड़ रही है सुरक्षा?

सऊदी अरब मिडिल ईस्ट में खुद को सुरक्षित करने की पूरी कोशिश कर रहा है. उसे लगातार ईरान और उसके सहयोगी गुटों से खतरा महसूस होता रहता है. यमन के हूती विद्रोही और इराकी मिलिशिया सऊदी अरब के ऑयल फैसेलिटीज पर कई बार अटैक कर चुके हैं. अक्सर रियाद पर ड्रोन और मिसाइल से हमले होते रहे हैं. इसीलिए सऊदी अपनी सुरक्षा को लेकर नए विकल्प तलाश रहा है.

पहले सऊदी पूरी तरह से सिर्फ अमेरिका पर निर्भर था. लेकिन अब वह अपनी डिफेंस पार्टनरशिप को डायवर्सिफाई करना चाहता है. पाकिस्तान और सऊदी के रिश्ते पहले से ही काफी मजबूत रहे हैं. करीब 25 लाख पाकिस्तानी नागरिक सऊदी में काम करते हैं. वहीं सऊदी अरब अक्सर पाकिस्तान की डूबती इकॉनमी को बचाने के लिए पैसा देता रहा है. यह नया समझौता उसी पुरानी दोस्ती का नया और अपडेटेड वर्जन है.

अमेरिका के बाद अब तुर्की-पाकिस्तान के भरोसे सऊदी अरब? (AI Generated Image)

क्या मिडिल ईस्ट की बदलती राजनीति से दुनिया में शुरू होगा कोई नया भयंकर संकट?

अमेरिका मिडिल ईस्ट में इस समय पूरी तरह से इजरायल के साथ खड़ा नजर आ रहा है. इससे कई अरब देश खुद को बहुत असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि क्षेत्रीय युद्ध के खतरों के कारण देश नए दोस्त और दुश्मन पहचान रहे हैं. तुर्की का इजरायल के साथ गाजा युद्ध को लेकर कड़ा तनाव चल रहा है. वह लेबनान और ईरान के मुद्दों पर भी इजरायल के खिलाफ खुलकर बोलता रहा है.

अंकारा के एक बड़े थिंक टैंक के स्ट्रेटजिस्ट निहत अली ओजकैन ने ब्लूमबर्ग को बताया कि बदलते हालात देशों को नए मैकेनिज्म डेवलप करने पर मजबूर कर रहे हैं. तुर्की एक ग्लोबल प्लेयर बनने की कोशिश में तेजी से आगे बढ़ रहा है. यह समझौता मिडिल ईस्ट के पावर बैलेंस को पूरी तरह से बदल सकता है.

क्या सच में यह डिफेंस एग्रीमेंट इन तीनों देशों के लिए गेम चेंजर साबित होगा?

यह नया समझौता तीनों देशों के लिए एक विन-विन सिचुएशन की तरह देखा जा रहा है.

  • पाकिस्तान इस समय बहुत ही भयंकर आर्थिक संकट से गुजर रहा है. उसे सऊदी अरब के पेट्रो डॉलर की सख्त जरूरत है. इसके बदले वह सऊदी को अपना न्यूक्लियर बैकअप और आर्मी सपोर्ट दे सकता है.
  • तुर्की अपनी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बड़े बाजार में बेचना चाहता है. वह सऊदी अरब को ड्रोन और आधुनिक हथियार सप्लाई कर सकता है. इसके साथ ही तुर्की की नजर मिडिल ईस्ट में अपनी धाक जमाने पर भी है.
  • सऊदी अरब को अमेरिका पर अपनी निर्भरता बहुत कम करनी है. इसलिए वह तुर्की और पाकिस्तान के रूप में नए बॉडीगार्ड तैयार कर रहा है. लेकिन ईरान की खुली धमकी ने यह साबित कर दिया है कि यह सफर इतना आसान नहीं होगा.

आने वाले समय में टेंशन और ज्यादा बढ़ सकती है.



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