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बेसन नहीं… महुआ से बना है यह लड्डू, झारखंड की परंपरा का...


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लातेहार में महुआ के लड्डू पारंपरिक और पौष्टिक व्यंजन हैं. इसे सूखे महुआ और ड्राई फ्रूट्स से बनाया जाता है. घी और इलायची मिलाकर यह आधे घंटे में तैयार होता है. यह सेहत के लिए बेहद फायदेमंद और ऊर्जा का स्रोत है. झारखंड की यह परंपरा अब काफी लोकप्रिय हो रही है.

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लातेहारः झारखंड की संस्कृति और परंपरा में महुआ का विशेष महत्व रहा है. गांवों में आज भी महुआ केवल एक पेड़ नहीं बल्कि जीवनशैली और परंपरा का हिस्सा माना जाता है. महुआ से कई तरह के पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जिनमें महुआ लड्डू खास पहचान रखता है. स्वाद और पौष्टिकता से भरपूर यह लड्डू वर्षों से झारखंड के घरों में बनाया जाता रहा है. अब महुआ उत्सव और पारंपरिक खानपान को बढ़ावा देने के साथ इसकी लोकप्रियता फिर बढ़ने लगी है.

लातेहार जिले के छिपादोहर में पलामू टाइगर रिजर्व के प्रोजेक्ट हुनर से रोजगार के तहत आयोजित महुआ उत्सव के दौरान रांची से पहुंची फूड साइंटिस्ट अर्पणा ने बताया कि महुआ लड्डू झारखंड की पुरानी परंपरा का हिस्सा है. उन्होंने कहा कि यह व्यंजन दादा-दादी के जमाने से गांवों में बनाया जाता रहा है और आज भी इसकी खास पहचान बनी हुई है. महुआ से बना यह लड्डू स्वादिष्ट होने के साथ शरीर के लिए भी लाभदायक माना जाता है.

ऐसे तैयार करें महुआ लड्डू  
अर्पणा मिंज में लोकल18 को बताया कि महुआ लड्डू बनाना बेहद आसान है. इसे थोड़ा खास और पौष्टिक बनाने के लिए बादाम, पीनट और काजू जैसे ड्राई फ्रूट्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. सबसे पहले इन सभी नट्स को हल्का भून लिया जाता है और फिर ओखली या मिक्सर की मदद से बारीक पीस लिया जाता है. इसके बाद सूखे महुआ को अलग से पीसकर उसका पाउडर तैयार किया जाता है. ध्यान रखना जरूरी है कि महुआ अच्छी तरह सूखा हुआ हो ताकि उसका स्वाद बेहतर आए.

लड्डू बनाने के लिए कड़ाही में घी गर्म किया जाता है. फिर उसमें पीसे हुए नट्स डालकर हल्का भुना जाता है. खुशबू बढ़ाने के लिए इलायची भी मिलाई जाती है. इसके बाद महुआ का पाउडर डालकर धीमी आंच पर भुना जाता है. जब मिश्रण हल्का लाल और सुगंधित हो जाए तो उसे उतारकर हाथों से लड्डू का आकार दिया जाता है. लगभग आधे घंटे में यह स्वादिष्ट पारंपरिक व्यंजन तैयार हो जाता है.

सेहत के लिए लाभदायक
महुआ लड्डू केवल स्वाद तक सीमित नहीं है बल्कि इसे ऊर्जा और पोषण का अच्छा स्रोत भी माना जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में इसे पारंपरिक पौष्टिक आहार के रूप में खाया जाता रहा है. आज आधुनिक खानपान के दौर में भी झारखंड की यह पारंपरिक मिठास लोगों को अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़ने का काम कर रही है.

About the Author

Prashun Singh

मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.



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