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देवघर बाबा बैद्यनाथ धाम के पेड़े बहुत प्रसिद्ध हैं. मंदिर से 30 किलोमीटर दूर घोरमारा बाजार को ‘पेड़ा नगरी’ कहते हैं. यहां शुद्ध खोए से पारंपरिक तरीके से पेड़े बनते हैं. श्रद्धालु बासुकीनाथ जाते समय यहां जरूर रुकते हैं. सावन में यहां रोज़ 100 क्विंटल से अधिक पेड़े बिकते हैं.
देवघर: देवघर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र तीर्थ स्थल है. हर साल लाखों श्रद्धालु यहां बाबा बैद्यनाथ पर जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं. खासकर श्रावण महीने में देवघर की रौनक देखने लायक होती है. दूर-दूर से आने वाले कांवरिया और श्रद्धालु बाबा के दर्शन के बाद यहां के प्रसिद्ध प्रसाद और स्थानीय स्वाद का आनंद लेना नहीं भूलते. देवघर की पहचान जितनी बाबा बैद्यनाथ धाम से है, उतनी ही यहां के पेड़े से भी जुड़ी हुई है. मंदिर के आसपास आपको पेड़े की कई दुकानें मिल जाएंगी, लेकिन देवघर से करीब 30 किलोमीटर दूर बासुकीनाथ मुख्य मार्ग पर स्थित घोरमारा बाजार की बात ही कुछ और है. यही वजह है कि इस जगह को लोग प्यार से ‘पेड़ा नगरी’ के नाम से जानते हैं.
घोरमारा पार करते ही मिलेंगे पेड़े की सैकड़ों दुकानें
घोरमारा बाजार में प्रवेश करते ही सड़क के दोनों किनारों पर पेड़े की सैकड़ों दुकानें नजर आने लगती हैं. यहां का माहौल ही अलग दिखाई देता है. सुबह से लेकर देर शाम तक दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है. स्थानीय लोगों के अनुसार कई दशकों से यहां पेड़ा बनाने और बेचने का काम हो रहा है. श्रावण मेले के दौरान तो यहां की रौनक कई गुना बढ़ जाती है. एक दिन में 100 क्विंटल से भी अधिक पेड़े की बिक्री होने की बात दुकानदार बताते हैं. यही नहीं, इस व्यवसाय से हजारों स्थानीय परिवारों की रोजी-रोटी भी जुड़ी हुई है. इसलिए घोरमारा का पेड़ा सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि यहां की पहचान और लोगों की आजीविका का भी अहम हिस्सा बन चुका है.
कई राज्यों के श्रद्धालु यहां रुककर लेते हैं पेड़ा
बाबा बैद्यनाथ धाम में पूजा करने के बाद अधिकांश श्रद्धालु बासुकीनाथ भी जाते हैं. इसी रास्ते में पड़ने वाला घोरमारा बाजार यात्रियों का पसंदीदा पड़ाव बन जाता है. लोग यहां रुककर पेड़ा खरीदते हैं और अपने घरों के लिए प्रसाद के रूप में लेकर जाते हैं. कई श्रद्धालु बताते हैं कि देवघर और बासुकीनाथ की यात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जाती, जब तक घोरमारा का पेड़ा साथ न ले लिया जाए. यही कारण है कि झारखंड ही नहीं, बिहार, पश्चिम बंगाल,उत्तरप्रदेश,ओडिशा और देश के कई अन्य राज्यों तक यहां का पेड़ा पहुंचता है.
क्या कहते हैं ग्राहक?
बिहार से आये ग्राहक टुनटुन जी बताते है कि घोरमारा के पेड़े की सबसे बड़ी खासियत इसकी शुद्धता है. यहां पेड़ा बनाने में मुख्य रूप से दूध से तैयार खोवा का उपयोग किया जाता है. स्थानीय कारीगर आज भी पारंपरिक तरीके से हाथों से खोवा तैयार करते हैं. मशीनों के बजाय पुराने तरीके को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे स्वाद और गुणवत्ता बरकरार रहती है. पेड़े में मिलावट न के बराबर होती है और इसकी सोंधी खुशबू लोगों को खूब पसंद आती है. यही वजह है कि एक बार इसका स्वाद चखने वाला व्यक्ति दोबारा यहां से पेड़ा खरीदना नहीं भूलता. घोरमारा का पेड़ा आज सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि श्रद्धा, परंपरा और स्थानीय मेहनत की पहचान बन चुका है. बाबा की नगरी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह प्रसाद आस्था का प्रतीक है. वहीं स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का मजबूत आधार. शायद यही वजह है कि सालों से घोरमारा की मिठास लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाए हुए है.
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मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.