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India Defence News: भारत अपने डिफेंस सिस्टम को लगातार मजबूत कर रहा है. जमीन से लेकर आसमान और समंदर तक को अभेद्य बनाया जा रहा है. रक्षा वैज्ञानिकों ने दो ऐसे फैसले लिए हैं, जो गेमचेंजर साबित हो सकते हैं. भारत पहले ही MIRV तकनीक से लैस मिसाइलों का सफल परीक्षण कर चुका है, ऐसे में नेक्स्ट जेनरेशन की दो रक्षा परियोजनाएं दुश्मन देशों का सिरदर्द बढ़ा सकती हैं. इनमें से एक प्रोजेक्ट एयरफोर्स और दूसरा इंडियन नेवी से जुड़ा है.
India Defence News: DRDO रुद्रम-1 एंटी रेडिएशन मिसाइल का नेक्स्ट जेनरेशन वेरिएंट डेवलप कर रहा है. पहले के मुकाबले इसका रेंज ज्यादा होगा. (फाइल फोटो/Reuters)
पहले बात करते हैं रुद्रम-1 की. भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता को नई मजबूती देने की दिशा में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) अब रुद्रम-1 एंटी-रेडिएशन मिसाइल के विस्तारित रेंज वाले संस्करण पर काम कर रहा है. इस नई परियोजना का उद्देश्य भारतीय वायुसेना की Suppression of Enemy Air Defences (SEAD) क्षमता को और अधिक प्रभावी बनाना है, ताकि दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस नेटवर्क को लंबी दूरी से ही निष्क्रिय किया जा सके. ‘इंडियन डिफेंस न्यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार, रुद्रम-1 के उन्नत संस्करण की मारक क्षमता करीब 290 से 300 किलोमीटर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. वर्तमान में रुद्रम-1 मिसाइल लगभग 100 से 250 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम मानी जाती है. रुद्रम-1 को मूल रूप से भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई (Su-30MKI) लड़ाकू विमान के लिए विकसित किया गया था. इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के सर्विलांस रडार, फायर कंट्रोल रडार, संचार तंत्र और इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाना है.
भारतीय रक्षा वैज्ञानिक एंटी-टॉरपीडो टॉरपीडो डेवलप कर रहा है. बताया जा रहा है कि इसमें डीआरडीओ को बड़ी सफलता भी मिली है. (फाइल फोटो/Reuters)
इस वजह से खास होगा रुद्रम-1 का न्यू वैरिएंट
बताया जा रहा है कि इस नई लंबी दूरी वाली रुद्रम-1 परियोजना में अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (BVRAAM) प्रोग्राम से विकसित तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है. विशेष रूप से ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर तकनीक और हाई-एनर्जी प्रोपेलेंट फॉर्मूलेशन को इसमें अपनाया जा रहा है. ड्यूल-पल्स प्रोपल्सन सिस्टम आधुनिक मिसाइल तकनीक में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है. पारंपरिक मिसाइलों में इंजन का ईंधन एक बार में जल जाता है, जबकि ड्यूल-पल्स तकनीक में प्रोपल्सन को दो अलग-अलग चरणों में विभाजित किया जाता है. इससे मिसाइल उड़ान के अंतिम चरण के लिए ऊर्जा बचाकर रख सकती है और लक्ष्य के करीब पहुंचने पर दोबारा तेज गति और गतिशीलता प्राप्त कर सकती है. यह तकनीक मिसाइल की मारक दूरी बढ़ाने के साथ-साथ अंतिम हमले के दौरान उसकी सटीकता और लक्ष्य को भेदने की क्षमता भी बढ़ाती है. यही वजह है कि दुनिया की कई आधुनिक लंबी दूरी की मिसाइलों में इस प्रकार की ऊर्जा प्रबंधन प्रणाली का उपयोग बढ़ रहा है. रुद्रम-1 का आकार अस्त्र मिसाइल की तुलना में कहीं बड़ा है.
भारत इधर समंदर से आसमान तक में चक्रव्यूह रच रहा है, उधर पाकिस्तान एयरफोर्स का एक के बाद एक दो जेट क्रैश हुए हैं. (AI जेनरेटेड तस्वीर)
नेवी के लिए खास ‘ब्रह्मास्त्र’
भारत ने पानी के भीतर होने वाले युद्ध में अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी Defence Research and Development Organisation (DRDO) ने भारतीय नौसेना के लिए अत्याधुनिक एंटी-टॉरपीडो-टॉरपीडो (ATT) हार्ड-किल सिस्टम के विकास को तेज कर दिया है. इस प्रणाली को नौसेना के विमानवाहक पोतों और परमाणु पनडुब्बियों जैसे रणनीतिक प्लेटफॉर्म की सुरक्षा के लिए तैयार किया जा रहा है. नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी (NSTL) द्वारा विकसित यह सिस्टम दुश्मन के टॉरपीडो का पता लगाने, उसकी पहचान करने और उसे लक्ष्य तक पहुंचने से पहले नष्ट करने में सक्षम होगा. मौजूदा सॉफ्ट-किल सिस्टम जहां डिकॉय और साउंड बेस्ड टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहते हैं, वहीं, ATT सीधे दुश्मन के टॉरपीडो को इंटरसेप्ट कर नष्ट करने की क्षमता रखता है. यह सिस्टम कुछ ही सेकंड में रिएक्शन देने के लिए डिजाइन की गई है, क्योंकि आधुनिक टॉरपीडो 50 नॉट से अधिक की रफ्तार से हमला कर सकते हैं. ATT में AI आधारित सेंसर फ्यूजन आर्किटेक्चर लगाया गया है, जो आने वाले खतरे की खुद ही पहचान कर हार्ड-किल प्रोसेस शुरू कर सकता है. सिस्टम में हाई-फ्रीक्वेंसी सक्रिय और निष्क्रिय सोनार सीकर लगाया गया है, जो दुश्मन टॉरपीडो की ध्वनि पहचानने में सक्षम है. 360 डिग्री सुरक्षा कवरेज देने वाला यह सिस्टम युद्धपोतों और पनडुब्बियों दोनों पर तैनात किया जा सकेगा.
पाकिस्तान में हाहाकार
पाकिस्तान में इन दिनों हाहाकार मचा हुआ है. एयरफोर्स के दो जेट्स एक के बाद एक क्रैा होने से खलबली मच गई. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वायुसेना के बेड़े में शामिल चीनी मूल के लड़ाकू विमानों की विश्वसनीयता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है. महज 24 घंटे के भीतर पाकिस्तान एयरफोर्स के दो विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गए. पहली घटना 19 मई 2026 को कमरा स्थित पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स के पास हुई, जहां चीन निर्मित JF-17 थंडर फाइटर जेट नियमित प्रशिक्षण मिशन के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया. रिपोर्टों के मुताबिक उड़ान के दौरान विमान में तकनीकी खराबी आ गई थी. विमान में सवार दोनों पायलट समय रहते इजेक्ट करने में सफल रहे. JF-17 थंडर को चीन की चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने विकसित किया है. पाकिस्तान इसे अपनी वायु शक्ति की रीढ़ मानता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इस श्रेणी के विमानों से जुड़े कई हादसों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं. इसी बीच 20 मई को पाकिस्तान वायुसेना का FT-7PG ट्रेनर विमान मियांवाली के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया. यह विमान भी चीनी मूल का है और उन्नत पायलट प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल किया जाता है. शुरुआती जानकारी के अनुसार प्रशिक्षण उड़ान के दौरान विमान में तकनीकी खराबी आई, जिसके बाद पायलट ने सुरक्षित इजेक्ट कर लिया. उसे चोटें आई हैं, लेकिन किसी नागरिक के हताहत होने की खबर नहीं है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें