नई दिल्ली: पहलगाम आतंकी हमले की जांच कर रही नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए ने एक बेहद खतरनाक साजिश का पर्दाफाश किया है. जांच में मिले डिजिटल सबूतों ने साबित कर दिया है कि कश्मीर और पंजाब में सक्रिय चरमपंथी नेटवर्क अलग नहीं हैं. इन दोनों फ्रंट्स की कमान पाकिस्तान में बैठे एक ही सिंडिकेट के हाथों में है. एनआईए की फॉरेंसिक जांच में सामने आया कि खालिस्तान समर्थक साइबर चैनल और लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट यानी टीआरएफ एक ही डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से संचालित हो रहे हैं. अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद जांच एजेंसियों ने इंटरनेट का जो डेटा खंगाला, उसमें पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा से जुड़े आईपी एड्रेस और विदेशी वर्चुअल नंबरों की पूरी चेन मिली है. इससे साफ हो गया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत के खिलाफ टू फ्रंट डिजिटल वॉर चला रही है.
पहलगाम आतंकी हमले के डिजिटल सुराग सीधे पाकिस्तान कैसे पहुंचे?
पहलगाम के बैसरन में 22 अप्रैल 2025 को आतंकियों ने 25 पर्यटकों और एक स्थानीय नागरिक की हत्या कर दी थी. इस कायराना हमले के कुछ ही घंटों बाद मस्टोडॉन जैसे ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म पर कश्मीर फाइट हैंडल से हमले की जिम्मेदारी ली गई. अंतरराष्ट्रीय दबाव और संयुक्त राष्ट्र में निंदा के बाद 25 अप्रैल को एक नए टेलीग्राम चैनल के जरिए खुद को पाक-साफ दिखाने का ड्रामा भी रचा गया.
एनआईए ने जब इन दोनों सोशल मीडिया पोस्ट्स की तकनीकी जांच की, तो पाकिस्तान की पोल खुल गई. पहली पोस्ट जिस आईपी एड्रेस से पब्लिश हुई थी, वह पाकिस्तान की कंपनी सीएमपाक का था. यह आईपी सीधे खैबर पख्तूनख्वा के बटाग्राम शहर से जुड़ा निकला. दूसरी पोस्ट के लिए इस्तेमाल किया गया टेलीग्राम अकाउंट रावलपिंडी के एक मोबाइल नंबर पर रजिस्टर्ड था. एनआईए ने चार्जशीट में स्पष्ट किया कि यह हमला पूरी तरह पाकिस्तान प्रायोजित था.
ईगल फ्रंट हैंडल ने कैसे उजागर किया खालिस्तान और टीआरएफ का गठजोड़?
डिजिटल फॉरेंसिक टीम ने जब कई चरमपंथी नेटवर्क्स की गहराई से पड़ताल की, तब एक बेहद चौंकाने वाला नोड सामने आया. जांचकर्ताओं ने पाया कि ईगल फ्रंट नाम का यूजरनेम खालिस्तान समर्थक चैनलों और टीआरएफ से जुड़े एकाउंट्स दोनों को बैकएंड से कंट्रोल कर रहा था. इसमें कश्मीर फाइट से जुड़ा केएफ पब्लिकल हैंडल भी शामिल था.
इन सभी हैंडल्स को ऑपरेट करने के लिए यूनाइटेड किंगडम के एक वर्चुअल वीओआईपी नंबर का इस्तेमाल किया गया था. विदेशी वर्चुअल नंबर का इस्तेमाल केवल इसलिए किया गया ताकि असली हैंडलर्स अपनी लोकेशन छुपा सकें. इसके बावजूद टेक्निकल एनालिसिस में यह साबित हो गया कि असली इंटरनेट ट्रैफिक पाकिस्तान से ही आ रहा था. जांच एजेंसियों का मानना है कि पंजाब और कश्मीर के लिए बनाए गए प्रोपेगैंडा विंग्स असल में एक ही पाकिस्तानी मास्टरमाइंड के इशारे पर काम कर रहे थे.
टेलीग्राम बॉट्स और ऑटोमेशन के जरिए कैसे फैलाया जा रहा था खूनी खेल?
एनआईए की जांच में यह भी खुलासा हुआ कि यह नेटवर्क केवल झूठा प्रचार फैलाने तक सीमित नहीं था. इन प्लेटफॉर्म्स पर युवाओं को बरगलाने वाला खतरनाक मटेरियल और बम बनाने के तरीके शेयर किए जा रहे थे. साथ ही भारत में रणनीतिक ठिकानों पर हमलों के खुले आह्वान भी लगातार पोस्ट किए जा रहे थे.
25 अप्रैल 2025 को टीआरएफ से जुड़ा एक ऑटोमेटेड टेलीग्राम बॉट एक्टिव किया गया था. इसका मुख्य मकसद पहलगाम हमले के बाद झूठे नरेटिव को सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल करना था. ऑटोमेशन और बॉट्स के जरिए सोशल मीडिया के सेफ्टी फिल्टर्स को चकमा देकर भारी मात्रा में भड़काऊ सामग्री फैलाई गई. यह तकनीक दिखाती है कि सीमा पार बैठे हैंडलर्स अब साइबर स्पेस के आधुनिक टूल्स का सहारा लेकर भारत में अस्थिरता पैदा करने की फिराक में हैं.
के-के कन्वर्जेंस से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को क्या खतरा है?
सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती कश्मीर और खालिस्तान यानी ‘के-के कन्वर्जेंस’ की है. पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स अलग-अलग पहचान बनाकर पंजाब में अलगाववाद और कश्मीर में जिहादी एजेंडा एक साथ आगे बढ़ा रहे हैं. इसका मकसद दुनिया के सामने यह दिखाना है कि ये दोनों अलग-अलग स्थानीय आंदोलन हैं.
हकीकत में यह एक ही सेंटर से कोऑर्डिनेट होने वाला खतरनाक डिजिटल षड्यंत्र है. एनआईए ने दिसंबर 2025 की मुख्य चार्जशीट और जुलाई 2026 में लश्कर सरगना हाफिज सईद के खिलाफ दाखिल सप्लीमेंट्री चार्जशीट में इस पूरे नेटवर्क को बेनकाब किया है. अब भारत की साइबर और सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी डिजिटल सर्विलांस को कई गुना मजबूत कर दिया है, ताकि इस सीमा पार सिंडिकेट के हर मोहरे को ध्वस्त किया जा सके