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भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का स्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों के पवित्र जल से पारंपरिक महाअभिषेक किया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस महास्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं, जिसके साथ ही अनवसर (अनसार) काल की शुरुआत हो जाती है। यह अवधि भगवान के विश्राम और विशेष सेवा के लिए होती है। सनातन परंपरा के तहत, अत्यधिक स्नान के कारण भगवान को ज्वर आने की मान्यता है। इस कारण वे लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि में श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और केवल सेवायत ही भगवान की गोपनीय सेवा करते हैं। अनवसर काल में भगवान को आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, काढ़ा, फल और हल्का भोग अर्पित किया जाता है। इसे भगवान के उपचार और स्वास्थ्य लाभ का समय माना जाता है। इस दौरान भक्त प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर पाते, लेकिन भगवान के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए पूजा-अर्चना करते हैं। विश्राम अवधि पूरी होने के बाद भगवान नवयौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे नवयौवन दर्शन या नेत्रोत्सव कहा जाता है। इसके अगले दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा भव्य रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। इस विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ का अस्वस्थ होना आस्था, लोकपरंपरा और मानवीय भावनाओं का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि भगवान भी लोकाचार का पालन करते हैं और विश्राम के बाद अपने भक्तों के बीच लौटकर उन्हें दर्शन देते हैं।
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