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मानसून से पहले पशुओं की कराएं डीवार्मिंग, एक्सपर्ट से जानें एल्बेंडाजोल की...


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मानसून से पहले पशुओं की कराएं डीवार्मिंग, एक्सपर्ट से जानें सही डोज

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Cattle Deworming: झारखंड में अगले कुछ दिनों में मानसून के दस्तक देने की संभावना है. ऐसे में जहां किसान खेती की तैयारियों में जुटे हैं, वहीं पशुपालकों को भी अपने पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर खास सतर्कता बरतने की जरूरत है. मानसून के मौसम में पशुओं में कई तरह की बीमारियों और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. इससे बचाव के लिए समय पर डीवार्मिंग, जो पेट के कीड़ों की दवा होती है, कराना बेहद जरूरी माना जाता है.

श्री कोडरमा गौशाला के पशु विशेषज्ञ रजनीश कुमार ने खास बातचीत में बताया कि बरसात के मौसम में खेतों में उगने वाली घास में अलग-अलग तरह के बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं. जब पशु इस घास का सेवन करते हैं, तो ये हानिकारक तत्व उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और पेट से जुड़ी समस्याओं का कारण बनते हैं.

उन्होंने कहा कि पशुओं के पेट में कई तरह के आंतरिक कीड़े विकसित हो जाते हैं, जो उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं. ऐसे कीड़ों के कारण पशुओं में भूख कम लगना, वजन घटना, कमजोरी, दूध उत्पादन में कमी और दस्त जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं. यदि समय पर इलाज नहीं किया जाए, तो पशु धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं और उनकी उत्पादन क्षमता भी प्रभावित होती है.

रजनीश कुमार ने बताया कि डीवार्मिंग कराने से पशुओं के पेट में मौजूद हानिकारक कीड़ों का नाश हो जाता है. इससे पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है और पशु का पूरा स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है. उन्होंने कहा कि पशु का पेट स्वस्थ रहेगा, तो उसका शरीर भी स्वस्थ रहेगा और वह बेहतर उत्पादन कर सकेगा.

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उन्होंने पशुपालकों को सलाह देते हुए कहा कि मानसून शुरू होने से पहले अपने पशुओं को एल्बेंडाजोल दवा जरूर दें. यह दवा बाजार में टैबलेट और लिक्विड दोनों रूपों में उपलब्ध है. पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार सही मात्रा में दवा देने से पशुओं को संक्रमण से बचाया जा सकता है. हालांकि दवा पशु चिकित्सक से संपर्क करने के बाद उनके बताए अनुसार ही दें.

उन्होंने बताया कि केवल मानसून से पहले ही नहीं, बल्कि पशुओं के बेहतर स्वास्थ्य और उत्पादकता के लिए हर चार महीने के अंतराल पर नियमित डीवार्मिंग कराना जरूरी है. नियमित डीवार्मिंग से पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है. उनका विकास बेहतर होता है और दूध उत्पादन पर भी अच्छा असर पड़ता है.



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