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मैंगो डिप्लोमेसी की वापसी! कूटनीति की मिठास और भरोसे की कसौटी… भारत-बांग्लादेश...


नई दिल्ली. ढाका से कोलकाता और अगरतला तक आम की मिठास जरूर पहुंची है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मिठास भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में घुली कड़वाहट को भी कम कर पाएगी? बांग्लादेश सरकार की ओर से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा को आम भेजना महज एक मौसमी सौजन्य नहीं, बल्कि एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश माना जा रहा है. इसे दक्षिण एशियाई राजनीति में एक बार फिर ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है.

दरअसल,बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के दौरान दोनों देशों के रिश्तों में पहले जैसी सहजता नहीं रही. शेख हसीना सरकार के हटने के बाद भारत और अंतरिम सरकार के बीच विश्वास का संकट पैदा हुआ. सबसे बड़ा कारण रहा बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों और उनके धार्मिक स्थलों पर लगातार हुए हमले. भारत ने कई मौकों पर इन घटनाओं पर चिंता जताई और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की. इससे दोनों देशों के संबंधों में स्वाभाविक रूप से तनाव बढ़ा.

इसके बाद तारिक़ रहमान की अगुवाई में बांग्लादेश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार बनी और उसने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए. ऐसे माहौल में आम भेजना केवल एक सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश भी है. दक्षिण एशिया में फलों, खासकर आम, के जरिए कूटनीति का लंबा इतिहास रहा है. पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक कई देशों ने समय-समय पर इसे रिश्तों में गर्मजोशी लाने के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है. आम को यहां केवल फल नहीं, बल्कि सद्भाव, संवाद और विश्वास का प्रतीक माना जाता है.

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मैंगो डिप्लोमेसी से रिश्तों में आई दरार नहीं भर सकती. भारत की सबसे बड़ी चिंता बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की सुरक्षा है. जब तक वहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर प्रभावी रोक नहीं लगती और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक विश्वास बहाली मुश्किल रहेगी. नई दिल्ली लगातार यह संकेत देती रही है कि दोनों देशों के संबंध केवल सांस्कृतिक या आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर भी टिके हैं.

दूसरी ओर, बांग्लादेश भी अच्छी तरह समझता है कि भारत उसके लिए केवल पड़ोसी नहीं, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदारों में से एक है. व्यापार, ऊर्जा, कनेक्टिविटी, सुरक्षा सहयोग और सीमा प्रबंधन जैसे कई क्षेत्रों में दोनों देशों की साझेदारी एक-दूसरे पर निर्भर है. ऐसे में ढाका के लिए भारत के साथ रिश्तों को सामान्य रखना उसकी अपनी राष्ट्रीय आवश्यकता भी है.

यही कारण है कि मैंगो डिप्लोमेसी को एक “सॉफ्ट सिग्नल” के रूप में देखा जा रहा है. यह संवाद शुरू करने का माध्यम हो सकता है, लेकिन रिश्तों की वास्तविक मरम्मत के लिए ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारस्परिक विश्वास और जमीनी स्तर पर सकारात्मक कदम जरूरी होंगे.

कुल मिलाकर, आम की यह टोकरी कूटनीति की भाषा में एक सकारात्मक पहल जरूर है, लेकिन भारत-बांग्लादेश संबंधों की मिठास केवल आम से नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और संवेदनशील मुद्दों पर ईमानदार कार्रवाई से लौटेगी. फिलहाल यह पहल संकेत देती है कि दोनों देशों के बीच संवाद के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, लेकिन उन्हें फिर से पूरी तरह खोलने के लिए सिर्फ मिठास नहीं, बल्कि भरोसे की भी जरूरत होगी.

मैंगो डिप्लोमेसी
एक जुलाई को विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा कि बांग्लादेश ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा को “सद्भावना के तौर पर” हिमसागर और आम्रपाली प्रजाति के आम भेजे हैं. स्थानीय मीडिया की खबरों के मुताबिक बांग्लादेश की ओर से दोनों मुख्यमंत्रियों को कुल 1,100 किलोग्राम आम भेजे गए जिनमें से 500 किलोग्राम आम कोलकाता और 600 किलोग्राम आम अगरतला भेजे गए हैं. अधिकारी ने बताया कि यह खेप सोमवार को बांग्लादेश के बेनापोल और अखौरा स्थलीय बंदरगाह के जरिए दोनों भारतीय राज्यों तक पहुंचीं.

बांग्लादेश 2021 से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आम भेजता रहा है, लेकिन 2024 में ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि उस समय सड़क पर हुए विरोध-प्रदर्शनों में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिर गई थी. हालांकि, इसके बाद बनी मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने 2025 में भारत के प्रधानमंत्री को आम भेजे थे, लेकिन इस साल उन्हें आम भेजने की कोई खबर अब तक सामने नहीं आई है.



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