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मोबाइल ऐप नहीं, प्रकृति थी मौसम वैज्ञानिक! जानिए कैसे गौरैया, चींटी और...


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यदि गौरैया बार-बार ‘टांव-टांव’ की आवाज करने लगे या धूल में लोटने लगे, तो इसे अगले 24 घंटे के भीतर बारिश होने का संकेत माना जाता था. इसी तरह जून के महीने में काठबेरका नामक एक प्रकार के मेंढक की लगातार आवाज को मानसून आने का संकेत माना जाता था.

पलामू: समय के साथ लोगों की जीवनशैली में बड़ा बदलाव आया है. आज मौसम की जानकारी के लिए ज्यादातर लोग मोबाइल ऐप, गूगल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहारा लेते हैं. कुछ ही सेकंड में मौसम का पूर्वानुमान मोबाइल स्क्रीन पर मिल जाता है. लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब न मौसम विभाग की चेतावनी होती थी और न ही कोई डिजिटल तकनीक. उस दौर में किसान और ग्रामीण केवल प्रकृति के संकेतों को देखकर बारिश, गर्मी और मौसम के बदलाव का सटीक अंदाजा लगा लेते थे. झारखंड के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी बुजुर्ग इन पारंपरिक संकेतों को मौसम की सबसे भरोसेमंद भाषा मानते हैं.

पक्षियों और जीव-जंतुओं के व्यवहार
लोक परंपराओं के जानकार तारकेश्वर सिंह चेरो बताते हैं कि पहले खेती की तैयारी पक्षियों और जीव-जंतुओं के व्यवहार को देखकर की जाती थी. यदि गौरैया बार-बार ‘टांव-टांव’ की आवाज करने लगे या धूल में लोटने लगे, तो इसे अगले 24 घंटे के भीतर बारिश होने का संकेत माना जाता था. इसी तरह जून के महीने में काठबेरका नामक एक प्रकार के मेंढक की लगातार आवाज को मानसून आने का संकेत माना जाता था.

चींटियों से मौसम का बड़ा संकेत
तारकेश्वर सिंह चेरो बताते हैं कि चींटियों की गतिविधियों को भी मौसम का बड़ा संकेत माना जाता था. अगर चींटियां अपने अंडों और बच्चों को लेकर बिल छोड़कर ऊंची जगह की ओर जाने लगें, तो लोग समझ जाते थे कि अच्छी बारिश होने वाली है. ऐसी मान्यता थी कि चींटियां पहले ही पानी भरने की संभावना को भांप लेती हैं. इसी तरह अगर बड़ी संख्या में मैना किसी पेड़ की डाल पर बैठी दिखाई दे, तो ग्रामीण इसे कुछ ही घंटों में अच्छी बारिश होने का संकेत मानते थे.

चील का व्यवहार भी मौसम का संकेत
तारकेश्वर सिंह के अनुसार चील का व्यवहार भी मौसम का संकेत देता था. यदि चील किसी ऊंचे पेड़ या चट्टान पर बैठकर तेज आवाज करने लगे, तो लोग समझ जाते थे कि मौसम बदलने वाला है. वहीं बारिश शुरू होने के बाद अगर पानी की बूंदें सामान्य से बड़ी दिखाई दें, तो इसे मूसलाधार बारिश का संकेत माना जाता था. अनुभवी किसान तापमान, ठंडी हवा और वातावरण में होने वाले बदलाव को देखकर भी वर्षा का सटीक अनुमान लगा लेते थे.

पर्यावरण की बेहतर समझ
तारकेश्वर सिंह चेरो का कहना है कि आधुनिक तकनीक ने मौसम की जानकारी लेना जरूर आसान बना दिया है. लेकिन प्रकृति के संकेतों का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है. ग्रामीण इलाकों में आज भी कई किसान पक्षियों, जीव-जंतुओं और प्राकृतिक बदलावों को देखकर खेती से जुड़े फैसले लेते हैं. यह पारंपरिक ज्ञान केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत ही नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव और पर्यावरण की बेहतर समझ का भी अनमोल उदाहरण है.

खेती और जीवन का आधार
आज भले ही लोग मौसम जानने के लिए मोबाइल और AI का इस्तेमाल कर रहे हों, लेकिन प्रकृति की यह पुरानी भाषा आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है. बुजुर्गों का मानना है कि तकनीक के साथ-साथ प्रकृति के संकेतों को समझना भी जरूरी है. यही ज्ञान पीढ़ियों से किसानों की खेती और जीवन का आधार रहा है.

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Amita kishor

न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें



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