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लातेहारः परिवार की जिम्मेदारी आई तो नीलम ने बंजर जमीन पर खड़ी...


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लातेहारः परिवार की जिम्मेदारी आई तो नीलम ने बंजर जमीन पर खड़ी कर दी नर्सरी

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लातेहार की नीलम देवी ने बंजर जमीन पर ‘दीदी बगिया नर्सरी’ शुरू की. JSLPS योजना से जुड़कर वे आत्मनिर्भर बनीं. शुरुआती संघर्ष के बाद अब वे सागवान, आम और महोगनी के पौधे बेचती हैं. इससे उन्हें हर सीजन 1.5 लाख रुपये तक का मुनाफा होता है. नीलम ने परिवार की आर्थिक स्थिति बदल दी.

आज के समय में घर की दहलीज लांघ कर महिलाएं घर चला रही है. अपने पेट के साथ बच्चे और परिवार का लालन पोषण भी महिला कर रही है. आज हम ऐसी हीं महिला के बारे में बताने जा रहे है. जहां कभी घर में दाल-रोटी का इंतजाम करना भी मुश्किल था. खेती से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि परिवार की जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें. लेकिन आज उसी परिवार की तस्वीर बदल चुकी है. घर की चौखट लांघकर शुरू किया गया एक छोटा-सा नर्सरी व्यवसाय अब नीलम देवी की आर्थिक मजबूती की पहचान बन गया है. एक सीजन में करीब 1.5 लाख रुपये तक का सीधा मुनाफा होता है.

बता दें कि लातेहार जिले के केचकी निवासी प्रमोद सिंह चेरो किसान हैं. उनकी पत्नी नीलम देवी भी पहले खेती में हाथ बंटाती थीं. जहां धान, गेहूं और सब्जियों की खेती के बावजूद आमदनी सीमित थी. कई बार घर की जरूरतें पूरी करने में भी परेशानी होती थी. इसी बीच नीलम देवी ने कुछ अलग करने का फैसला लिया और वर्ष 2021 में जेएसएलपीएस से जुड़कर ‘दीदी बगिया नर्सरी’ की शुरुआत की.

नीलम देवी ने बताया कि नर्सरी शुरू करना आसान नहीं था. शुरुआती दो साल नीलम देवी के लिए काफी संघर्ष भरे रहे. नर्सरी में पौधे तैयार होते थे, लेकिन उन्हें खरीदने के लिए ग्राहक नहीं आते थे. इसके बाद उन्होंने खुद लोगों के बीच जाना शुरू किया और घर-घर पौधों की जानकारी देने के साथ उन्हें उपलब्ध कराने लगीं. धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा और नर्सरी पर खरीदार पहुंचने लगे.

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उन्होंने बताया कि आज के एक साल में हजारों लाखों पौधों की मांग है. जहां एक ओर शिव शिष्य परिवार संस्था की ओर से भी हजारों पौधों की मांग होती है. वहीं कारोबारी भी उनसे पौधे लेने आते है. ये मांग ने उनके छोटे से प्रयास को बड़े कारोबार का रूप दे दिया है.

उन्होंने कहा कि जिस जमीन पर कभी कुछ खास नहीं होता था, उसी करीब 8 डिसमिल जमीन पर आज नीलम देवी की नर्सरी लहलहा रही है. यहां शीशम, सागवान, आम, शरीफा, अमरूद, महोगनी और आंवला समेत कई तरह के पौधे तैयार किए जा रहे हैं. उनकी मेहनत ने बंजर जमीन को भी आमदनी के साधन में बदल दिया है.

नीलम देवी ने बताया कि नर्सरी शुरू करने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया. कभी जहां दाल-रोटी के लिए चिंता रहती थी, वहीं अब अपनी मेहनत से अच्छी आमदनी हो रही है. उनका कहना है कि अगर कोई पौधे खरीदना चाहता है तो सीधे उनसे संपर्क कर सकता है. नीलम की कहानी बताती है कि सही प्रशिक्षण, मेहनत और हौसले के साथ गांव की महिलाएं भी अपने परिवार की आर्थिक तस्वीर बदल सकती हैं.

बता दें कि नीलम देवी की कहानी महिला के आत्मनिर्भरता की अनोखा मिसाल है. जो कम संसाधन और ग्रामीण क्षेत्र में रहने के बावजूद अपने घर की स्थिति को बेहतर कर रही है. जहां उन्होंने बंजर जमीन से अपना खेती बारी कर अच्छा मुनाफ कमा रही है. नीलम देवी ने कहा कि उनका सपना है कि एक बड़ा नर्सरी संचालन करना जहां किसी भी तरह के फूल पौधे आसानी से कम दरों पर उपलब्ध हो आज भी वो कम पैसे में लोगों को ये पौधे उपलब्ध कराती है.



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