उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसे फैसले हुए. जिन्होंने सिर्फ सरकार नहीं बल्कि पूरी सियासत का रुख बदल दिया. लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि किसी मुख्यमंत्री के एक फैसले के बाद अगले ही दिन उनकी कुर्सी पर ही संकट आ गया हो? अगर हां तो बहुत अच्छी बात है. अगर आपको नहीं पता है तो आज हम आपको बताते हैं ये किस्सा. यह कहानी 1979 की है और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव से जुड़ी है. जनता पार्टी की सरकार के दौरान RSS की शाखाओं को लेकर एक आदेश जारी हुआ. इसके बाद पार्टी के भीतर ऐसा सियासी घमासान मचा कि राम नरेश यादव बहुमत का समर्थन खो बैठे. आखिर वह फैसला क्या था? RSS को लेकर विवाद क्यों हुआ और अगले ही दिन मुख्यमंत्री की कुर्सी कैसे चली गई? ‘UP CM के गजब किस्से’ के इस भाग में पढ़िए इस पूरे सियासी किस्से की कहानी.
1977 में जनता पार्टी ने कांग्रेस को हराया
कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. साल था 1977. देश में इमरजेंसी के बाद पहली बार लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव हुए थे. कांग्रेस को बड़ा झटका लगा. कई विपक्षी दल साथ आए और जनता पार्टी बनी. उत्तर प्रदेश में भी जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया. 425 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी ने 351 सीटें जीतीं.
मुख्यमंत्री पद को लेकर जनता पार्टी के भीतर खींचतान हुई. आखिरकार विधायकों ने राम नरेश यादव को अपना नेता चुना. 23 जून 1977 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उनके मंत्रिमंडल में अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के नेता शामिल थे. इनमें मुलायम सिंह यादव भी थे.
जनता पार्टी में कई विचारधाराएं साथ आई थीं
असल कहानी यहीं से शुरू होती है. जनता पार्टी कोई एक विचारधारा वाली पार्टी नहीं थी. कांग्रेस विरोध के नाम पर कई दल और राजनीतिक धाराएं एक साथ आई थीं. इसमें समाजवादी नेता थे, कांग्रेस से अलग हुए नेता थे और भारतीय जनसंघ की पृष्ठभूमि वाले नेता भी थे. जनसंघ के कई नेता RSS से जुड़े हुए थे. जनता पार्टी बनने के बाद सवाल उठा कि क्या कोई नेता एक साथ जनता पार्टी का सदस्य और RSS से जुड़ा रह सकता है? इसी सवाल ने आगे चलकर ‘डुअल मेंबरशिप’ यानी दोहरी सदस्यता विवाद का रूप ले लिया. यही विवाद धीरे-धीरे जनता पार्टी के अंदर बड़ा संकट बन गया. उत्तर प्रदेश में इसका सीधा असर राम नरेश यादव की सरकार पर पड़ा.
RSS से रिश्ते पर भिड़े जनता पार्टी के नेता
1979 की शुरुआत तक जनता पार्टी के भीतर मतभेद काफी बढ़ चुके थे. RSS से जुड़े जनसंघ पृष्ठभूमि वाले नेताओं और दूसरे धड़ों के बीच तनाव खुलकर सामने आने लगा. 11 फरवरी 1979 को भारतीय जनसंघ की पृष्ठभूमि वाले जनता पार्टी के कई सदस्य राम नरेश यादव की कैबिनेट से बाहर हो गए. उनके RSS से संबंधों को लेकर विवाद चल रहा था. इसके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में हालात और तेजी से बदले. राम नरेश यादव सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल बहुमत का था. सरकार के भीतर ही खींचतान शुरू हो चुकी थी.
14 फरवरी को आया वह बड़ा आदेश
अब कहानी का सबसे अहम मोड़ आता है. 14 फरवरी 1979 को राम नरेश यादव सरकार ने आदेश जारी किया कि सार्वजनिक स्थानों पर RSS की शाखाएं बिना अनुमति आयोजित नहीं की जा सकेंगी. यानी मामला सिर्फ पार्टी के अंदर चल रही बहस तक सीमित नहीं रहा. सरकार का फैसला सीधे RSS की सार्वजनिक गतिविधियों से जुड़ गया. इस आदेश के बाद जनता पार्टी के भीतर पहले से चल रहा विवाद और तेज हो गया. यही वह फैसला था, जिसे आज राम नरेश यादव की सरकार के आखिरी दिनों की कहानी में सबसे ज्यादा याद किया जाता है.
अगले दिन ही हुआ शक्ति परीक्षण
14 फरवरी को आदेश आया और अगले ही दिन यानी 15 फरवरी 1979 को जनता पार्टी विधायक दल की बैठक हुई. यहां राम नरेश यादव को बहुमत का समर्थन नहीं मिल सका. नतीजा साफ था. पार्टी के भीतर उनका समर्थन कमजोर पड़ चुका था. आखिरकार राम नरेश यादव को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा. उन्होंने 15 फरवरी को इस्तीफा दिया. हालांकि नए मुख्यमंत्री के शपथ लेने तक वह कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर बने रहे. यानी जिस फैसले के अगले दिन विधायक दल की बैठक हुई, उसी बैठक में उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी बच नहीं सकी.
फिर बनारसी दास बने मुख्यमंत्री
राम नरेश यादव के इस्तीफे के बाद जनता पार्टी ने नया नेता चुना. 28 फरवरी 1979 को बनारसी दास ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यूपी विधानसभा के रिकॉर्ड में राम नरेश यादव का मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल 23 जून 1977 से 28 फरवरी 1979 तक दर्ज है. उनके बाद बनारसी दास ने सरकार की कमान संभाली. इस तरह राम नरेश यादव का मुख्यमंत्री कार्यकाल करीब पौने दो साल में खत्म हो गया. जनता पार्टी की अंदरूनी लड़ाई ने सरकार को कमजोर किया और आखिरकार नेतृत्व भी बदल गया.
सिर्फ RSS विवाद ही पूरी कहानी नहीं
यहां एक बात समझना जरूरी है. राम नरेश यादव की सरकार का संकट सिर्फ 14 फरवरी के आदेश से एक दिन में पैदा नहीं हुआ था. जनता पार्टी के भीतर लंबे समय से मतभेद चल रहे थे. RSS से जुड़े नेताओं की दोहरी सदस्यता का विवाद उसी बड़े राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा था. इंडियन एक्सप्रेस की राजनीतिक इतिहास संबंधी रिपोर्ट के मुताबिक, जनसंघ पृष्ठभूमि वाले नेताओं के कैबिनेट से बाहर होने और RSS शाखाओं को लेकर आदेश के बाद राम नरेश यादव अगले दिन जनता पार्टी विधायक दल में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं कर सके. इसलिए इसे केवल एक आदेश से सरकार गिरने की कहानी के बजाय जनता पार्टी के अंदर लंबे समय से चल रहे सत्ता और विचारधारा के संघर्ष का अंतिम पड़ाव कहना ज्यादा सही होगा.