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Belfast Violence Explainer: उत्तरी आयरलैंड के बेलफास्ट में भड़की हिंसा को केवल एक दर्दनाक वारदात से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है. इसके पीछे वर्षों से जमा सामाजिक असुरक्षा, तेजी से बदलती जनसांख्यिकी, शरणार्थी मुस्लिमों को लेकर बढ़ती नाराजगी, संसाधनों पर दबाव और कमजोर पड़ती कानून-व्यवस्था जैसी कई कारण हैं. स्थानीय समुदायों में अपने इलाकों पर नियंत्रण खोने का डर बढ़ रहा है, जबकि सोशल मीडिया पर कुछ समूह इस माहौल को और भड़का रहे हैं.
नार्थ आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में अब दंगे बेकाबू हो चले हैं.
Belfast Violence Explainer: आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में 8 जून 2026 की रात दर्दनाक वारदात के बाद से पूरा शहर दंगे की आग में धधक रहा है. दरअसल, एक अपार्टमेंट के बाहर एक बुजुर्ग व्यक्ति पर एक शख्स ने चाकू से अंधाधुंध वार करना शुरू कर दिया. बुजुर्ग व्यक्ति के सिर, गर्दन और पीठ पर चाकू से कई वार किए गए. मौके से गुजर रहे कुछ लोगों ने हमलावर को काबू कर बुजुर्ग व्यक्ति को बचाने की कोशिश की. इसी बीच स्थानीय पुलिस भी मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने 30 साल के इस हमलावर को गिरफ्तार कर लिया. वहीं, इस पूरी वारदात का सीसीटीवी फुटेज अगले कुछ घंटों में पूरे बेलफास्ट में वायरल हो गया. साथ ही, लोगों को यह भी पता लग गया कि हमलावर सूडान मूल का एक शरणार्थी है.
हमलावर की पहचान पता चलते ही स्थानीय लोगों के दिल में सालों से धधकती आग आक्रोश बनकर बाहर आने लगे. देखते ही देखते बेलफास्ट की तमाम इलाके दंगों की आग में धधकने लगे. 9 जून की शाम होते-होते उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट की सड़कों पर नकाबपोश युवकों की भारी भीड़ उतर आई. इन नकाबपोशों ने ग्लाइडर बसों और सड़क से गुजरती कारों को आग में झोंकना शुरू कर दिया. ये दंगे यही तक सीमित नहीं रहे, बल्कि बेलफास्ट में रहने वाले शरणार्थी मुस्मिल समुदाय की घरों और दुकानों को भी निशाना बनाया जाने लगा. देर रात तक पूरे शहर में हाहाकार मच चुका था. कानून और व्यवस्था लगभग पूरी तरह से पुलिस के कंट्रोल से बाहर जा चुकी थी.
सतही तौर पर देखने पर भले ही यह मामला एक दर्दनाक वारदात से जुड़ा हुआ लगता है. लेकिन, इसकी सतह पर जाएं तो चाकूबाजी इस वारदात ने स्थानीय नागरिकों के लिए ट्रिगर का काम किया है. ‘सिर तन से जुदा’ के नारा देने वाले मुस्मिल शरणार्थियों को लेकर लोगों का गुस्सा तो बेलफास्ट की गलियों में पिछले कई सालों से जमा हो रहा था. लेकिन इस वारदात के बाद ऐसा लगा जैसे उनके सब्र का बांध अब टूट चुका है. नतीजा, पूरी दुनिया बेलफास्ट के दंगों के तौर पर देख रहा है. इंटरनेशनल रिपोर्ट की मानें तो बेलफास्ट के हालत कुछ ऐसे हैं कि वहां के स्थानीय निवासी अब एक भी प्रवासी मुसलमान को अपनी शहर में नहीं देखना चाह रहे हैं.
बेलफास्ट इलाके में नकाबपोश दंगाई शरणार्थी इलाकों की दुकानों, मकानों के साथ कारों और बसों को भी आग के हवाले कर रहे हैं.
कैसे फैला बेलफास्ट में खास समुदाय के खिलाफ दंगा
इस पूरी हिंसा की क्रोनोलॉजी को समझने के लिए सबसे पहले सोमवार रात की उस घटना और उसके बाद के डिजिटल नैरेटिव को देखना होगा. जैसे ही पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लिया, इस वारदात से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल होने लगा. कुछ ही घंटों में ब्रिटेन और आयरलैंड के इन्फ्लुएंसर्स और बॉट्स ने इस वीडियो को लपक लिया. इस वीडियो में साफ तौर एक एक ही संदेश दिया जा रहा था कि एक बाहरी शख्स ने हमारे देश में आकर हमारे नागरिक की जान लेने की कोशिश की है.
इस डिजिटल मोबिलाइजेशन का नतीजा यह हुआ कि मंगलवार शाम को उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी बेलफास्ट के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. देखते ही देखते ये प्रदर्शन हिंसक दंगों में बदल गए. कामकाजी वर्ग की आबादी वाले शंकील रोड जैसे इलाकों में नकाबपोश दंगाइयों ने चुन-चुनकर मुस्लिम प्रवासी परिवारों के घरों को निशाना बनाया. एक अफ्रीकी फूड स्टोर और एक तुर्की नाई की दुकान को फूंक दिया गया. यह साफ दिखाता है कि गुस्सा किसी अपराधी के खिलाफ नहीं, बल्कि एक पूरी कम्युनिटी और पहचान के खिलाफ मोड़ दिया गया था.
यहां पर है बेलफास्ट में फैले दंगो की असली जड़
- उत्तरी आयरलैंड और उसकी राजधानी बेलफास्ट का इतिहास भी बहुत कुछ अच्छा नहीं है. यहां पर दशकों से दो समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष का इतिहास रहा है. इन दो समुदायों में एक है प्रोटेस्टेंट और दूसरा है कैथोलिक. प्रोटेस्टेंट यूके के साथ रहना चाहते हैं और कैथोलिक आयरलैंड के साथ जाना चाहते हैं.
- इस संघर्ष के चलते बेलफास्ट कभी भी लंदन, बर्मिंघम या डबलिन की तरह मल्टी कल्चरल शहर नहीं बन पाया. कुछ साल पहले तक यहां पर प्रवासियों की संख्या ना के बराबर थी. लेकिन पिछले पांच-छह सालों में हालात तेजी से बदले हैं.
- ब्रिटेन की शरणार्थी नीति और रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ खुली सीमा का फायदा उठाकर हजारों की संख्या मे मध्य-पूर्व और अफ्रीका से आए मुस्लिम शरणार्थियों को उत्तरी आयरलैंड पहुंचा दिया. यूके होम ऑफिस ने इन शरणार्थियों को ठहराने के लिए बेलफास्ट और उसके आस-पास के कामकाजी वर्ग के इलाकों के होटलों और हॉस्टलों का इस्तेमाल किया.
- यूके होम ऑफिस के इस कदम से स्थानीय नागरिकों का मन असुरक्षा से भर गया. स्थानीय लोगों के भीतर यह भावना बैठ गई है कि सरकार उनसे बिना पूछे उनके छोटे और सीमित संसाधनों वाले शहर में सैकड़ों अनजान लोगों को बसा रही है.इसकी वजह से सोशल हाउसिंग, हेल्थ सर्विसेज और स्थानीय स्कूलों पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे खुद उनके बच्चों का हक मारा जा रहा है.
- उत्तरी आयरलैंड को मूल नागरिक खुद को अपने ही देश में अजनबी महसूस करने लगे हैं. उन्हें लगा कि वे अपने ही इलाके पर कंट्रोल खो रहे हैं. ऐसे में एक चिंगारी ने बड़े विस्फोट का काम किया और उसका नतीजा बेलफास्ट के दंगों के तौर पर सबके सामने हैं.
बेलफास्ट की सड़कों पर हो रहा विरोध प्रदर्शन अब किसी घटना को लेकर नहीं, बल्कि शरणार्थी मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हो चला है.
बेलफास्ट में पुराना है हिंसा का काला इतिहास
- बेलफास्ट की हिंसा को समझने के लिए वहां के इतिहास के उस काले पन्ने को पलटना जरूरी है, जिसे ‘द ट्रबल्स’ कहा जाता है. 1960 के दशक से लेकर 1998 में हुए गुड फ्राइडे समझौते तक बेलफास्ट ने वो दौर देखा है जब बम धमाके और सरेआम गोलियां चलना आम बात थी.
- इस दौर ने शहर में एक ‘पैरामिलिट्री कल्चर’ को जन्म दिया. दोनों पक्षों के पास अपने-अपने हथियारबंद गैंग थे. भले ही 1998 में शांति समझौता हो गया, लेकिन ग्राउंड लेवल पर ये गैंग और उनके सोचने का हिंसक तरीका पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. ये गैंग आज भी क्राइम सिंडिकेट्स या लोकल विजिलेंटे ग्रुप्स के तौर पर बेलफास्ट की गलियों में एक्टिव हैं.
- अब मुस्मिल शरणार्थियों के खिलाफ शुरू हुई इस हिंसा के बाद इसी पैरामिलिट्री माइंडसेट का एक नया रूप देखने को मिल रहा है. पहले इन स्थानीय गैंग्स का दुश्मन दूसरा धार्मिक गुट होता था, लेकिन अब उन्हें शरणार्थी मुस्लिम के तौर पर एक नया टारगेट मिल गया है.
- सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस नैरेटिव ने उत्तरी आयरलैंड की पारंपरिक राजनीतिक दरार को भी पाट दिया है. सोशल मीडिया पर ऐसे कई नैरेटिव देखे गए हैं जहां धुर-ब्रिटिश समर्थक और धुर-आयरिश राष्ट्रवादी, जो कभी एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे, इस मसले पर दोनों एक सुर में बात करते नजर आ रहे हैं.
क्या सिर्फ निंदा से शांत हो जाएगी बेलफास्ट की हिंसा
इस हिंसा के बाद उत्तरी आयरलैंड की फर्स्ट मिनिस्टर मिशेल ओ’नील और सिन फेन के सांसद जॉन फिनुकैन सहित सभी प्रमुख दलों ने इस हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा की है. उन्होंने इसे गुंडागर्दी के साथ नस्लवाद करार दिया है. लेकिन, सवाल अभी भी यही है कि क्या निंदा करने से इस सुलगती हुई आग को शांत हो जाएगी. रिपोर्ट तो यह बता रही हैं कि इस निंदा के बा बेलफास्ट में हिंसा रुकने की बजाय अपने बढ़ती हुई दिख रही है. साथ ही, इस हिंसा की आंच ब्रिटेन की तरफ भी बढ़ती हुई नजर आ रही है.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international security affairs…और पढ़ें