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पलामू की सुमित्रा देवी पहले मात्र ₹3000 के मानदेय पर काम करती थीं. उन्होंने हार नहीं मानी और जैविक खाद यूनिट की स्थापना की. अब वे वर्मी कंपोस्ट और जैविक दवाएं तैयार करती हैं. उनके खाद की पूरे जिले में भारी मांग है. सुमित्रा देवी अब हर महीने ₹1 लाख का मुनाफा कमा रही हैं.
पलामू: जिले की महिलाओं की मेहनत और आत्मनिर्भरता की कहानी आज पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन रही है. कभी पारंपरिक खेती कर परिवार चलाने के लिए संघर्ष करने वाली सुमित्रा देवी आज जैविक खाद उत्पादन के जरिए हर महीने लाखों रुपए की कमाई कर रही हैं. खेती से जहां पहले परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होता था, वहीं अब जैविक खाद यूनिट ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी है.
दरअसल, पलामू जिले के नीलांबर पीताम्बर पुर प्रखंड अंतर्गत नौडीहा ग्राम निवासी सुमित्रा देवी ने वर्ष 2017 में जेएसएलपीएस से जुड़कर कृषि मित्र के रूप में काम शुरू किया था. उस समय उन्हें मात्र तीन हजार रुपए मानदेय मिलता था. खेती से सालाना करीब 10 से 15 हजार रुपए की ही आमदनी हो पाती थी, जिससे घर चलाना काफी मुश्किल था. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जैविक खेती तथा जैविक खाद निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया. सरकार, जेएसएलपीएस और पंचायत प्रतिनिधियों के सहयोग से नि:शुल्क जैविक संसाधन केंद्र की स्थापना की गई, जहां आज वर्मी कंपोस्ट, सुपर कंपोस्ट, जैविक दवा, जैविक बीज और शिवांश खाद तैयार किया जाता है.
3 माह में तैयार होती खाद
उन्होंने बताया कि इस यूनिट में कुल 20 बेड बनाई गई हैं. प्रत्येक बेड चार फीट चौड़ी, 12 फीट लंबी और ढाई फीट गहरी है. जैविक खाद तैयार होने में लगभग तीन महीने का समय लगता है. गोबर, मिट्टी और अन्य जैविक पदार्थों को मिलाकर लगातार 90 दिनों तक उसमें पानी दिया जाता है. इसके बाद खाद को निकालकर चलनी से छाना जाता है. एक बेड से करीब चार क्विंटल खाद तैयार होती है. इस तरह 20 बेड से लगभग 80 क्विंटल जैविक खाद का उत्पादन किया जाता है.
सुमित्रा देवी ने लोकल18 को बताया कि उनकी तैयार जैविक खाद की मांग अब पूरे पलामू जिले में होने लगी है. किसान 20 रुपए प्रति किलो की दर से खाद खरीदते हैं. इसके अलावा जैविक बीज और जैविक दवाओं की भी अच्छी बिक्री होती है. हर महीने करीब एक लाख रुपए तक का मुनाफा हो जाता है.
किसानों को कर रहीं प्रेरित
सुमित्रा देवी ने आगे कहा कि पहले खेती में मेहनत अधिक और मुनाफा कम होता था, लेकिन जैविक खाद यूनिट लगाने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है. आज वे न सिर्फ आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि दूसरे किसानों और महिलाओं को भी जैविक खेती के लिए प्रेरित कर रही हैं. उनकी सफलता यह साबित करती है कि अगर सही मार्गदर्शन और मेहनत मिले तो गांव की महिलाएं भी स्वरोजगार के जरिए अपनी अलग पहचान बना सकती हैं.
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मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.