देवघर. हिंदू धर्म में चातुर्मास को पूजा-पाठ, भक्ति और साधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है. इस दौरान भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी वजह से शादी-विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ और अन्य सभी शुभ व मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. साल 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी से होगी, जबकि 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी के साथ इसका समापन होगा. आखिर इन चार महीनों का धार्मिक महत्व क्या है और इस दौरान किन नियमों का पालन करना चाहिए, इसे लेकर हमने देवघर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुदगल से खास बातचीत की. आइए जानते हैं क्या कहते हैं.
क्या कहते हैं देवघर के ज्योतिषाचार्य
देवघर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुदगल ने लोकल 18 के संवाददाता से बातचीत करते हुए कहा कि 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी है. उस दिन से चातुर्मास प्रारंभ हो जाएगा, लेकिन 12 जुलाई को गुरु अस्त हो रहे हैं. जिस वजह से 12 जुलाई के बाद से ही मांगलिक कार्य बंद हो जाएंगे. वहीं, चातुर्मास का समय भगवान की भक्ति और आत्मशुद्धि का काल माना जाता है.
भगवान शिव संभालते हैं कार्यभार
धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीने बाद देवउठनी एकादशी को जागते हैं. इसी कारण इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, जनेऊ, मुंडन और अन्य शुभ संस्कार नहीं किए जाते. उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु के विश्राम काल में सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव और माता पार्वती संभालते हैं.
सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक के ये चार महीने पूजा, व्रत, जप, तप और भगवान की आराधना के लिए सबसे उत्तम माने गए हैं. इस दौरान किया गया दान-पुण्य और सेवा कार्य सामान्य दिनों की तुलना में अधिक फलदायी माना जाता है.
क्या करें, क्या न करें चातुर्मास के दौरान
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, चातुर्मास में लोगों को सात्विक और हल्का भोजन करना चाहिए. मांस-मदिरा, तामसिक भोजन और बुरी आदतों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. हर दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करें, तुलसी की सेवा करें और अपनी क्षमता के अनुसार गरीब व जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और जल का दान करें. कई श्रद्धालु इस दौरान जमीन पर चटाई बिछाकर सोने, नियमित व्रत रखने और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करने का भी संकल्प लेते हैं.
ईश्वर के करीब जाने का श्रेष्ठ समय
हालांकि, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए ऐसे नियम अनिवार्य नहीं माने गए हैं. धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति चातुर्मास में सच्चे मन से भगवान का स्मरण करता है और संयमित जीवन जीता है, उसके जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता का वास होता है. इसलिए इन चार महीनों को केवल शुभ कार्यों पर रोक का समय नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और ईश्वर के करीब आने का सबसे श्रेष्ठ अवसर माना जाता है.