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Jamshedpur News: जमशेदपुर के बर्मामाइंस स्थित श्री सेवा आश्रम में करीब 50 साल से हर साल 72 घंटे की राधा गोविंद की खास पूजा होती है. इस पूजा के दौरान रोज 3 से 4 हजार लोगों के लिए भंडारा होता है और कई राज्यों से कलाकार इसमें शामिल होने आते हैं. इस दौरान पूरे क्षेत्र का वातावरण भक्तिमय हो जाता है.
जमशेदपुर. झारखंड को अपनी संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक विरासत के लिए पूरे देश में अलग पहचान मिली हुई है. यहां आज भी गांवों और मोहल्लों में पुरानी सभ्यता जीवित दिखाई देती है. आधुनिकता और इंटरनेट के इस दौर में भी कई ऐसे स्थान हैं, जहां लोग हर वर्ष एकजुट होकर धार्मिक परंपराओं को उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं, जैसे वर्षों पहले निभाई जाती थीं. ऐसी ही एक अनोखी और प्रेरणादायक परंपरा देखने को मिलती है जमशेदपुर के बर्मामाइंस स्थित श्री सेवा आश्रम में, जहां पिछले करीब 50 वर्षों से प्रतिवर्ष राधा-गोविंद पूजा का आयोजन किया जा रहा है.
लगातार 72 घंटे चलती है पूजा
आश्रम के मुखिया गोपाल पत्रो ने बताया कि यह पूजा लगातार 72 घंटे तक चलती है. इस दौरान पूरा गांव, मोहल्ला और आसपास के लोग भक्ति में डूबे रहते हैं. पूजा की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती है. लोग अपने घर, आंगन और पूरे मोहल्ले को सजाने में जुट जाते हैं. रंग-बिरंगी रोशनी, फूलों की सजावट और भक्ति संगीत से पूरा वातावरण इतना सुंदर हो जाता है कि मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया हो.
रोज 3-4 हजार के लिए भोजन की व्यवस्था
सबसे खास बात यह है कि इस पूजा में सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे की झलक भी देखने को मिलती है. यहां रोजाना लगभग 3 से 4 हजार लोगों के लिए उत्तम भोजन की व्यवस्था की जाती है. सुबह से लेकर देर रात तक भंडारा चलता रहता है, जिसमें हर वर्ग और हर उम्र के लोग शामिल होते हैं. कोई छोटा-बड़ा नहीं, सभी एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं.
साल में एक बार होनी चाहिए ऐसी पूजा
गोपाल पत्रो ने बताया कि इस पूजा का मुख्य उद्देश्य समाज में शांति, भाईचारा और सकारात्मकता बनाए रखना है. साथ ही बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और समाज कल्याण की कामना भी इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है. बड़े-बुजुर्गों का मानना है कि वर्ष में एक बार इस तरह की पूजा जरूर होनी चाहिए, क्योंकि इससे पूरे गांव और समाज में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है.
दूसरे राज्यों से आए हैं कलाकार
आज के समय में जहां लोग मोबाइल और इंटरनेट में व्यस्त रहते हैं, वहीं इस पूजा के दौरान लोग इन सबसे दूरी बनाकर एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं. बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी मिलकर भक्ति गीतों, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं. इस आयोजन में वेस्ट बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से भी कलाकारों की टीमें पहुंचती हैं, जो अपनी पारंपरिक कला और भक्ति प्रस्तुतियों से लोगों का मन मोह लेती हैं.
हर गुजरते साल के साथ यह पूजा और भी भव्य होती जा रही है. यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने वाली ऐसी सांस्कृतिक विरासत है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है.
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बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें