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60 फीट ऊपर लटक कर शिव की आराधना, आदिवासियों की अनोखी परंपरा,...


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झारखंड में चड़क पूजा के दौरान भक्ति का अद्भुत संगम दिखता है. भक्त 60 फीट ऊंचे बांस पर शरीर में हुक लगवाकर लटकते हैं. यह कठिन साधना भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक है. रोंगटे खड़े कर देने वाले इस दृश्य को देखने हजारों लोग उमड़ते हैं. यह परंपरा प्राचीन संस्कृति को आज भी जीवित रखे हुए है.

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जमशेदपुर: झारखंड की धरती अपनी पारंपरिक संस्कृति, लोक आस्था और अनोखे पर्वों के लिए जानी जाती है. इन्हीं परंपराओं में एक खास नाम है चड़क पूजा. यह पर्व सिर्फ एक पूजा नहीं बल्कि आस्था, साहस और भगवान शिव के प्रति गहरी भक्ति का प्रतीक माना जाता है. हर साल चैत महीने के अंतिम दिनों में गांवों और कस्बों में यह पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.

चड़क पूजा की सबसे खास और रोमांचक परंपरा होती है ऊंचे बांस पर भक्तों का लटकना. गांव के मैदान में करीब 50 से 60 फीट ऊंचा मजबूत बांस लगाया जाता है. इसके ऊपरी हिस्से में एक लंबा घुमने वाला डंडा बांधा जाता है. पूजा और मंत्रोच्चार के बाद भगवान शिव के भक्त अपने शरीर में हुक लगवाकर उस बांस से लटकते हैं और फिर उन्हें गोल-गोल घुमाया जाता है. यह दृश्य देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है.

मनोकामना होती पूरी
भक्तों का मानना है कि यह कठिन साधना भगवान शिव के प्रति उनकी श्रद्धा और समर्पण को दर्शाती है. कई लोग अपने परिवार की सुख-शांति, अच्छी फसल, बीमारी से मुक्ति और मनोकामना पूरी होने की कामना लेकर यह तपस्या करते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि इतनी कठिन परंपरा के बावजूद भक्तों के चेहरे पर दर्द नहीं बल्कि भक्ति और विश्वास दिखाई देता है.

पूरे माहौल में ढोल-नगाड़ों की आवाज, शंखध्वनि और “हर-हर महादेव” के जयकारे गूंजते रहते हैं. महिलाएं पूजा करती हैं, बच्चे मेले का आनंद लेते हैं और गांव की गलियां रंग-बिरंगी रोशनी और सजावट से भर जाती हैं. कई जगहों पर लोकनृत्य, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं.

क्या है चड़क पूजा?
जमशेदपुर के कुइयानी, बोड़ाम गांव के प्रधान अवनिकांत मंडल ने बताया कि चड़क पूजा झारखंड की उस लोक संस्कृति को जीवित रखे हुए है, जहां आधुनिकता के दौर में भी लोग अपनी परंपराओं और आस्था से गहराई से जुड़े हुए हैं. यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति, विश्वास और ग्रामीण जीवन की खूबसूरती से परिचित कराता है. उन्होंने कहा कि इस पूजा को शिव पूजा भी कहा जाता है.

आज भी जब 50 से 60 फीट ऊंचे बांस पर भक्त आस्था के साथ झूलते हैं, तो यह दृश्य सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि झारखंड की जीवंत संस्कृति और अटूट विश्वास की पहचान बन जाता है.

About the Author

Prashun Singh

मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.



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