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शहर को स्वच्छ और सुविधाजनक बनाने के नाम पर सरकारी खजाने से खर्च किए गए 1.36 करोड़ रुपए की बर्बादी का हाल देखना हो तो गिरिडीह के मॉड्यूलर यूरिनल इसकी बानगी हैं। वर्ष 2019-20 में करीब 1 करोड़ 36 लाख रुपए खर्च कर शहर के अलग-अलग स्थानों पर बनाए गए 72 मॉड्यूलर शौचालयों में से अधिकांश आज बदहाल हो चुके हैं। स्थिति यह है कि करीब 60 फीसदी यूरिनल का नामोनिशान तक मिट गया है। कुछ स्थानों पर शौचालय के नाम पर केवल ढांचा बचा है। कहीं टाइल्स और पैन उखड़ चुके हैं तो कहीं दीवारों में दरारें पड़ गई हैं। कई शौचालय ऐसे स्थानों पर बनाए गए थे, जहां आम लोगों का पहुंचना भी मुश्किल है। नालों के किनारे और झाड़ियों के बीच बने इन शौचालयों का उपयोग शुरू से ही सीमित रहा। नतीजतन, आम लोगों को सुविधा देने के लिए खर्च की गई बड़ी राशि का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। शहर के प्रमुख बाजारों में भी शौचालय की सुविधा नहीं होने से आम लोगों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों से आने वालों को परेशानी होती है। विडंबना यह है कि पुराने मॉड्यूलर शौचालयों की बदहाली के बीच नगर निगम की ओर से अब पांच नए मॉड्यूलर यूरिनल बनाने की स्वीकृति मिलने की बात कही जा रही है। लेकिन पहले से बने 72 शौचालयों में से अधिकांश के बर्बाद होने के बाद उनके रखरखाव और नियमित देखभाल की कोई ठोस व्यवस्था सामने नहीं आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पुराने शौचालयों को संभाला नहीं जा सका तो नए निर्माण के बाद उनकी देखभाल कैसे होगी।
1.36 करोड़ की उपयोगिता और रखरखाव पर सवाल निर्माण पर खर्च हुए 1.36 करोड़ रुपए की उपयोगिता और रखरखाव को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कई मॉड्यूलर शौचालय पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं, जबकि कुछ स्थानों पर उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। वर्तमान में बस स्टैंड, सदर अस्पताल और नगर थाना के पास ही पे एंड यूज व्यवस्था के तहत सामुदायिक शौचालय संचालित हैं। ऐसे में शहर के प्रमुख बाजारों में शौचालय की सुविधा का अभाव लोगों की परेशानी बढ़ा रहा है।