दुनिया पहले ही रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से जूझ रही है और अब मौसम वैज्ञानिकों ने एक ऐसी चेतावनी दी है, जो किसी कयामत से कम नहीं. प्रशांत महासागर में उठ रहा सुपर अल नीनो आने वाले महीनों में दुनिया के कई देशों में काल बनकर टूट सकता है. एक नए अनुमान के मुताबिक, जून 2026 से मार्च 2027 के बीच इस सुपर अल नीनो के कारण दुनियाभर में करीब 8.57 लाख लोगों की जान जा सकती है. इसमें भारत को लेकर भी बेहद डराने वाला अनुमान जताया गया है, जिसमें अगले छह महीनों में यहां भीषण गर्मी के कारण 55000 से ज्यादा लोगों की मौत की आशंका जताई गई है.
वैसे यह आंकड़ा किसी भविष्यवाणी की तरह निश्चित संख्या नहीं है, बल्कि एक मॉडल पर आधारित अनुमान है. इसमें 1996 से 2005 के बीच दर्ज मौतों के औसत को आधार बनाकर मौतों का आकलन किया गया है.
भारत में 1.60 लाख लोगों की मौत का अनुमान
इस रिपोर्ट में भारत को सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल किया गया है. जून 2026 से मार्च 2027 तक भारत में गर्मी से जुड़ी करीब 1.60 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान है. इनमें से अगले छह महीनों में लगभग 55,200 मौत होने की आशंका जताई गई है.
भारत के लिए यह चेतावनी इसलिए भी अहम है, क्योंकि देश के कई हिस्सों में गर्मी का असर पहले से ही गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनता रहा है. अत्यधिक तापमान से बुजुर्गों, बच्चों, खुले में काम करने वाले लोगों और पहले से बीमार व्यक्तियों पर सबसे ज्यादा खतरा रहता है. ऐसे में लंबे समय तक चलने वाली गर्मी स्वास्थ्य सेवाओं और स्थानीय प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है.
नाइजीरिया में सबसे ज्यादा मौतों की आशंका
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के अनुमान में नाइजीरिया सबसे ज्यादा प्रभावित देश के रूप में सामने आया है. वहां अगले छह महीनों में ही गर्मी से जुड़ी करीब 56,100 अतिरिक्त मौतों की आशंका जताई गई है. वहीं जून से मार्च तक का कुल अनुमान करीब 69,700 है.
भारत और चीन भी कुल अनुमानित मौतों के लिहाज से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल हैं. चीन में जून से मार्च तक करीब 85,400 अतिरिक्त मौतों का अनुमान है. वहीं, इंडोनेशिया में इस अवधि के दौरान करीब 49,500 मौतों का अनुमान लगाया गया है, जिनमें से 29,300 अगले छह महीनों में हो सकती हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत, चीन और नाइजीरिया में होने वाली अनुमानित मौतें दुनिया के कुल अतिरिक्त मौतों के एक-तिहाई से ज्यादा हो सकती हैं.
| देश | कुल अतिरिक्त मौतें | अगले छह महीनों का अनुमान |
|---|---|---|
| भारत | 1,60,000 | 55,200 |
| चीन | 85,400 | -240 |
| नाइजीरिया | 69,700 | 56,100 |
| सूडान | 53,200 | 14,700 |
| इंडोनेशिया | 49,500 | 29,300 |
| ब्राजील | 26,700 | 19,500 |
| कांगो | 24,700 | 11,300 |
| बांग्लादेश | 18,400 | 6,700 |
| वियतनाम | 18,100 | 8,300 |
| चाड | 17,000 | 17,300 |
इस लिस्ट में कुछ देशों के आंकड़े असामान्य दिख सकते हैं. उदाहरण के लिए, चीन के लिए अगले छह महीनों का अनुमान नकारात्मक है, जबकि चाड का छह महीने का आंकड़ा कुल अवधि के अनुमान से अधिक है. मॉडल में अलग-अलग अवधियों और आधार रेखा के मुकाबले बदलाव के कारण ऐसे आंकड़े सामने आ सकते हैं. इन्हें वास्तविक मौतों की गिनती नहीं समझना चाहिए.
क्या है सुपर अल नीनो और क्यों बढ़ती है गर्मी?
अल नीनो प्रशांत महासागर की एक प्राकृतिक जलवायु घटना है. जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है, तो इसे अक्सर ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है. ऐसे मजबूत अल नीनो की घटनाएं सामान्य तौर पर हर 10 से 15 साल के अंतराल पर देखने को मिलती हैं, जबकि सामान्य अल नीनो की घटनाएं लगभग दो से सात साल के बीच अनियमित रूप से होती रहती हैं.
अल नीनो के दौरान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश, तापमान, सूखे और तूफानों के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है.
समुद्र में जमा अतिरिक्त गर्मी का कुछ हिस्सा वातावरण में पहुंचता है. इससे दुनियाभर के तापमान में और बढ़ोतरी हो सकती है. हालांकि, दुनिया में बढ़ती गर्मी के लिए केवल अल नीनो को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. लंबे समय से जारी मानवजनित जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग भी तापमान बढ़ने की बड़ी वजह हैं.
कहीं सूखा, कहीं बाढ़ और कहीं जंगलों में आग
अल नीनो का असर दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में दिखाई देता है. आम तौर पर इसका प्रभाव अमेरिका के कुछ हिस्सों, दक्षिण अमेरिका और यूरोप में शरद और सर्दियों के दौरान ज्यादा बारिश तथा तूफानी मौसम के रूप में सामने आ सकता है.
इसके उलट ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनने का खतरा रहता है. इंडोनेशिया में सूखे के दौरान जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ सकती हैं. इन आग से निकलने वाला धुआं आसपास के देशों तक पहुंचकर वायु प्रदूषण और सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों में भी इसका असर देखने को मिल सकता है.
सितंबर के बाद क्यों बढ़ गया मौतों का अनुमान?
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब का ताजा अनुमान, सितंबर 2026 में जारी किए गए उसके पिछले आकलन से काफी ज्यादा है. संस्थान के मुताबिक, अगस्त और सितंबर में तापमान अनुमान से कहीं अधिक गर्म रहा. अगस्त को रिकॉर्ड का सबसे गर्म अगस्त और सितंबर को दूसरा सबसे गर्म सितंबर बताया गया.
हालांकि, विशेषज्ञों ने इस साल गर्मियों में दर्ज रिकॉर्ड तापमान को केवल अल नीनो का नतीजा मानने से आगाह किया है. उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ने भी तापमान को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है. अल नीनो का सबसे मजबूत प्रभाव आम तौर पर साल के आखिरी महीनों और सर्दियों के दौरान देखने को मिलता है.
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक माइकल ग्रीनस्टोन के मुताबिक, इस ट्रैकर का मकसद यह पता लगाना है कि अत्यधिक गर्मी किन इलाकों में सबसे ज्यादा जानलेवा साबित हो सकती है. उनका कहना है कि पहले से जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान होने पर सरकारों और प्रशासन को समय रहते कदम उठाने का मौका मिल सकता है.
कैसे इतना ताकतवर हो रहा सुपर अल नीनो?
अल नीनो की बढ़ती तीव्रता को लेकर भी वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ रही है. इस साल ‘साइंस’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में दावा किया गया कि औद्योगिक युग शुरू होने से पहले के मुकाबले अल नीनो की घटनाएं 36 फीसदी से ज्यादा मजबूत हो गई हैं. अध्ययन के मुताबिक, पिछले 40 वर्षों में इसकी तीव्रता में करीब 16 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
मिशिगन यूनिवर्सिटी की पेलियोक्लाइमेट वैज्ञानिक और अध्ययन की प्रमुख लेखिका जूलिया कोल के मुताबिक, अल नीनो की बढ़ती ताकत का संबंध वैश्विक तापमान में मानवजनित बढ़ोतरी से नजर आता है. उनके अनुसार, मजबूत अल नीनो का मतलब दुनिया भर में जलवायु संबंधी खतरों और चरम मौसमी घटनाओं का ज्यादा गंभीर होना भी है.
इससे पहले ‘लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ की रिपोर्ट में बताया गया था कि 2023 में अत्यधिक गर्मी से दुनिया भर में रिकॉर्ड 7.10 लाख लोगों की मौत हुई. शोधकर्ताओं ने इनमें से 70 फीसदी से अधिक मौतों के लिए मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार बताया था.