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झारखंड बनने से अबतक राज्य सभा के लिए यहां 7 उपचुनाव और 12 दो वर्षीय सहित 19 चुनाव हुए हैं। इस बार भी दो सीटों के लिए चुनाव होने जा रहा है। झारखंड में राज्यसभा चुनाव के दौरान प्रथम और द्वितीय वरीयता के वोट और क्रॉस वोटिंग की कहानी नई नहीं है। यहां इन वजहों से राज्यसभा चुनाव परिणाम और समीकरण कई बार बदल चुका है। इस बार भी इस खेल राजनीतिज्ञ और विधायी विशेषज्ञ इंकार नहीं कर रहे हैं। यही वजह है कि निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की जीत की वजह क्रॉस वोटिंग ही माना जा रहा है। रद्द हुआ एक भी वोट बदल देगा पूरा समीकरण इस चुनाव में सत्तारूढ़ झामुमो के लिए अपने पहले उम्मीदवार के लिए ठीक 28 मतों का दांव लगाना जोखिम से खाली नहीं है। यदि एक भी वोट रद्द होता है, तो पूरा समीकरण बिगड़ सकता है। ऐसी स्थिति में यदि झामुमो अपने उम्मीदवार को सुरक्षित करने के लिए प्रथम वरीयता के 29 या 30 मत दिलाता है, तो सत्तारूढ़ गठबंधन के दूसरे उम्मीदवार के पास केवल 25 या 26 वोट बचेंगे। ऐसी स्थिति में दूसरे उम्मीदवार को जीतने के लिए विपक्ष से बड़ी सेंधमारी या अन्य दांव लगाने होंगे। सत्तारूढ़ दल को अपनी दूसरी सीट और विपक्ष को अपनी एकमात्र सीट बचाने के लिए ‘द्वितीय वरीयता’ के वोटों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। झारखंड में राज्य सभा का चुनाव प्रत्याशी और प्रस्तावक के लिहाज से ही नहीं चुनाव परिणाम के लिए भी दिलचस्प रहा है। कभी सुनिश्चित जीत हार में तबदील हुआ तो कभी .01 के न्यूनतम मत के अंतर से हार जीत हुई है। आंकड़ों से समझिए कहां फंस सकता है पेंच इस बार झामुमो के 34 विधायक हैं। जीत के लिए उसे 28 ही चाहिए। इसलिए उसके उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित मानी जा रही है। महागबंधन एक जुट रहा, तब ही कांग्रेस की जीत हो सकती है। अभी महागठबंधन में कुल 56 विधायक हैं। झामुमो के प्रथम वरीयता के 28 वोट के बाद 06 वोट शेष बचता है। कांग्रेस के पास कुल 16 विधायक हैं। झामुमो के शेष छह वोट मिलाकर कुल 22 वोट हो जाता है। छह वोट राजद के चार विधायक और माले के दो विधायक से पूरा हो जाता है। यदि महागठबंधन का वोट एकजुट रहा तो कांग्रेस की जीत सुनिश्चित हो जाएगी। यदि क्रॉस वोटिंग या भीतरघात हुओ तो मामला फंस सकता है। क्रॉस वोटिंग होने पर ही नाथवाणी की जीत होगी। एक्सपर्ट से समझिए तकनीकी बात झारखंड विधानसभा के रिटायर संयुक्त सचिव मधुकर भारद्वाज के मुताबिक राज्य सभा के मतदान में यदि झामुमो के सभी 34 विधायकों ने अपने प्रत्याशी को मत दिया तो कांग्रेस प्रत्याशी के लिए अधिकतम 22 मत और भाजपा समर्थित निर्दलीय के लिए 24-25 मत प्रथम वरीयता के उपलब्ध रहेंगे। सत्ता पक्ष की आपसी प्रतिबद्धता बनी रहे और कांग्रेस के प्रत्याशी को झामुमो के कम से कम 4 प्रथम वरीयता के मत मिले तभी वह प्रत्यक्षत: निर्दलीय प्रत्याशी से आगे रहेंगे और संभावित दूसरी वरीयता के लिए दौड़ में बनें रहेंगे। निर्दलीय प्रत्याशी को 24-25 मत निश्चित लगते हैं। अगर सदस्यों की अनुपस्थिति या त्रुटिपूर्ण मतपत्र के कारण कुल वैध मत 81 से कम हो जाते हैं तो निर्धारित कोटा कम होगा और परिस्थिति बदल सकती है। कुल मत का कम होना कांग्रेस के लिए परेशानी बढ़ाएगा। क्योंकि झामुमो के प्रथम वरीयता के मत के बिना वह निर्दलीय प्रत्याशी से चार मत यूं ही पीछे है। कांग्रेस के लिए जीत तभी संभव है जब झामुमो का कम से कम चार प्रथम वरीयता के और इतने ही दूसरी वरीयता का मत झामुमो को मिले मतपत्र से मिले। निर्दलीय प्रत्याशी की जीत के लिए कुल मतदान का कम होना और झामुमो के अतिरिक्त मत में चाहे प्रथम वरीयता का हो या द्वितीय वरीयता का शेयर लेना जरूरी होगा।
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