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मशीनों के जमाने में जिंदा हाथ का हुनर, बोकारो के 80 साल...


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Bokaro 80 Year Old Rope Artist: बोकारो के काशी झरिया गांव में 80 साल के बुर्जुग रहते हैं जो आज के समय में भी प्लास्टिक से अपने हाथ से रस्सी बनाते हैं. ये इस गांव की आखिरी पीढ़ी हैं जो ये काम कर रहे हैं. एक रस्सी बनाने में 3 घंटे तक का समय लगता है और बाजार में कीमत अधिकतम 150 रुपये मिलती है.

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बोकारो. 80 साल की उम्र, हाथों में प्लास्टिक के पुराने बोरे और दशकों पुराना हुनर. बोकारो जिले के चास प्रखंड स्थित काशी झरिया गांव के दिगम जी आज भी वही काम कर रहे हैं, जो उन्होंने बरसों पहले अपने पिता से सीखा था, हाथों से रस्सी बनाने की कारीगरी, जो कभी ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी, आज धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है, लेकिन दिगम जैसे कुछ कारीगर अब भी इस हुनर को जिंदा रखे हुए हैं.

प्लास्टिक की बोरियों से निकलती है पट्टी
बता दें, दिगम प्लास्टिक के पुराने बोरों से मजबूत रस्सियां तैयार कर हाट-बाजारों में बेचते हैं और इन रस्सियों का उपयोग पशुओं को बांधने, कुएं से पानी निकालने और अन्य घरेलू कामों में किया जाता है. लोकल18 से खास बातचीत में दिगम जी ने बताया हैं कि वह कई दशकों से यह काम कर रहे हैं और इसकी शिक्षा उन्हें अपने पिता से मिली थी. पहले सोंनचाप पौधे के छिलके से रस्सियां बनाई जाती थीं, लेकिन समय के साथ कच्चे माल की उपलब्धता कम होने लगी. इसके बाद उन्होंने प्लास्टिक के बोरों की पतली पट्टियों का उपयोग शुरू किया.

तीन घंटे में बनती है रस्सी, इतनी मिलती है कीमत
दिगम जी ने आगे बताया कि एक पूरी रस्सी तैयार करने में करीब दो से तीन घंटे का समय लगता है. वह सप्ताह भर में लगभग 40 से 50 रस्सियां बना लेते हैं, जिन्हें आसपास के गांवों और स्थानीय हाट-बाजारों में बेचते हैं. वहीं, बकरियों के गले में बांधने वाली रस्सी की कीमत 50 रुपये जोड़ा है, जबकि बाल्टी या कुएं में उपयोग होने वाली बड़ी रस्सियों की कीमत 100 से 150 रुपये तक होती है.

वहीं, रस्सी बनाने की प्रक्रिया को लेकर दिगम जी ने बताया कि सबसे पहले प्लास्टिक के बोरे की सिलाई को खोला जाता है. इसके बाद बोरे की पतली-पतली पट्टियों को अलग किया जाता है. फिर इन पट्टियों को एक साथ जोड़कर हाथों से मरोड़ते हुए मजबूती से गूंथा जाता है और कई चरणों की मेहनत के बाद एक मजबूत रस्सी तैयार होती है.

ये काम करने वाली आखिरी पीढ़ी
दिगम जी ने आखिर में बताया कि वह गांव की आखिरी पीढ़ी हैं, जो यह काम कर रहे हैं और नई पीढ़ी के युवा अब इसमें रुचि नहीं रखते. वे मजदूरी के जरिए अपना जीवनयापन कर रहे हैं, और अब कई सालों से मशीनों से बनने वाली रस्सियों के बाजार में आने से हाथ से बनी रस्सियों की मांग लगातार घट गई है.

पहले के समय में हफ्ते में उनकी 100 रस्सियां आसानी से बिक जाती थीं, वहीं अब बिक्री घटकर करीब 30 से 40 रस्सियों तक सीमित हो गई है और इसका सीधा असर उनकी आय पर भी पड़ा है. लेकिन अब यह उनकी पहचान बन गई है और वह आखिरी सांस तक रस्सी बनाने का काम करेंगे.

About the Author

Raina Shukla

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें



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