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Brahmos Cruise Missle: बिगड़ते सामरिक माहौल को देखते हुए भारत अपने डिफेंस सिस्टम को लगातार अपडेट कर रहा है. खासकर मिसाइल सिस्टम और फाइटर जेट डेवलपमेंट के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों ने उल्लेखनीय प्रगति की है. भारत पांचवीं पीढ़ी के साथ ही फ्यूचरिस्टिक फाइटर जेट डेवलप करने में जुटा है. जहां तक मिसाइल सिस्टम की बात है तो ब्रह्मोस और अग्नि सीरीज की मिसाइल्स का नाम सुनते ही दुश्मन डर से कांपने लगते हैं.
ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल के 1500 किलोमीटर वाले वैरिएंट के डेवलपमेंट में कई तरह की तकनीकी बाधाओं को पार करना होगा. (फोटो: Reuters)
भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस आने वाले वर्षों में अपनी मौजूदा क्षमता से कहीं आगे जाने की तैयारी में है. ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सीईओ और प्रबंध निदेशक डॉ. जयतीर्थ राघवेंद्र जोशी ने संकेत दिया है कि मिसाइल की मारक क्षमता को लंबी अवधि में करीब 1,500 किलोमीटर तक ले जाना एक प्रमुख लक्ष्य है. अगर यह क्षमता हासिल होती है तो ब्रह्मोस केवल रीजनल प्रिसीजन अटैक करने वाली मिसाइल नहीं रह जाएगी, बल्कि भारत की लंबी दूरी की कन्वेंशनल स्ट्राइक कैपेबिलिटी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली मिसाइल सिस्टम बन सकती है. जब ब्रह्मोस को भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल किया गया था, तब इसकी रेंज करीब 290 किलोमीटर तक सीमित थी. यह सीमा मुख्य रूप से तकनीकी कमी की वजह से नहीं, बल्कि मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) से जुड़ी पाबंदियों के कारण थी. रूस इसके संस्थापक सदस्यों में था और उस समय 300 किलोमीटर से अधिक रेंज तथा निर्धारित पेलोड क्षमता वाली मिसाइल प्रणालियों के संयुक्त विकास और निर्यात पर प्रतिबंध महत्वपूर्ण बाधा था.
न्यूज रिपोर्ट की मानें तो ब्रह्मोस मिसाइल के 700 से 900 किलोमीटर वाली वैरिएंट का ट्रायल हो चुका है. (फोटो: Reuters)
1500 किलोमीटर वाले वैरिएंट की राह में सबसे बड़ी बाधा क्या है?
भारत के 2016 में MTCR में शामिल होने के बाद स्थिति बदली. इसके बाद ब्रह्मोस के अलग-अलग संस्करणों की रेंज लगातार बढ़ाई गई. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, लगातार ट्रायल्स के जरिए इसकी क्षमता करीब 450 और फिर 500 किलोमीटर तक पहुंची, जबकि हाल के डेवलपमेंट ने इसे लगभग 800-900 किलोमीटर की श्रेणी में पहुंचाने की दिशा दिखाई है. अब 1,500 किलोमीटर की क्षमता हासिल करना अगली बड़ी तकनीकी चुनौती होगी. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लंबी दूरी के लिए मिसाइल का आकार बहुत अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता. ब्रह्मोस को भारतीय नौसेना के वर्टिकल लॉन्च सिस्टम, कोस्टल लॉन्चर और भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमान से इस्तेमाल किया जाना है. इसलिए बाहरी आयामों (External Dimensions) को लगभग समान रखते हुए अंदर अधिक फ्यूल और बेहतर प्रोपल्सन कैपेबिलिटी हासिल करनी होगी. इसके लिए हल्के और मजबूत कंपोजिट पदार्थों का इस्तेमाल महत्वपूर्ण हो सकता है. कार्बन-फाइबर जैसे आधुनिक कंपोजिट धातु के कई हिस्सों का वजन कम कर सकते हैं. इससे मिसाइल के कुल वजन में कमी आएगी और उपलब्ध जगह तथा वजन का बड़ा हिस्सा ईंधन के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा. यानी मिसाइल का आकार बढ़ाए बिना उसकी क्षमता को बढ़ाना जरूरी होगा.
ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत ही बड़ा चैलेंज
ब्रह्मोस की प्रमुख ताकत उसका लिक्विड फ्यूल रैमजेट इंजन है, जो उसे फ्लाइट के बड़े हिस्से में सुपरसोनिक गति बनाए रखने में मदद करता है. 1500 किलोमीटर की रेंज के लिए इंजन की ईंधन खपत, कम्ब्यूस्टन (दहन दक्षता) और एयरफ्लो को बेहतर बनाना होगा. इंटर्नल फ्यूल टैंकों की डिजाइन में बदलाव और उपलब्ध ईंधन से अधिक ऊर्जा निकालने वाली तकनीकें भी अहम होंगी. बूस्टर सिस्टम में भी सुधार की गुंजाइश होगी. भारत पहले ही मूल रूसी सॉलिड प्रोपेलेंट बूस्टर की जगह स्वदेशी डिजाइन अपना चुका है. भविष्य के संस्करणों में अधिक ऊर्जा वाले प्रोपेलेंट, हल्के बूस्टर केसिंग और बेहतर थ्रस्ट प्रोफाइल के जरिए मिसाइल को शुरुआती चरण में अधिक कुशलता से गति दी जा सकती है. इससे रैमजेट इंजन के सक्रिय होने से पहले मिसाइल को जरूरी ऊर्जा हासिल करने में मदद मिलेगी.
यह भी बड़ी रुकावट
रेंज बढ़ाने में उड़ान पथ भी निर्णायक भूमिका निभाएगा. कम ऊंचाई पर हवा का प्रतिरोध अधिक होता है, जिससे ईंधन की खपत बढ़ती है. लंबी दूरी के संस्करण अधिक ऊंचाई पर क्रूज कर सकते हैं, जहां हवा पतली होने से ड्रैग कम रहता है. इसके बाद लक्ष्य के करीब पहुंचते समय मिसाइल तेजी से नीचे आकर समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ान भर सकती है. इससे उसकी पहचान करना मुश्किल होता है और अंतिम हमले के दौरान सुपरसोनिक गति का लाभ बरकरार रहता है. इसके अलावा लंबी दूरी के साथ नेविगेशन और टार्गेट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को भी अधिक एडवांस बनाना होगा. मिसाइल को लंबे समय तक सटीक मार्ग पर बनाए रखने के लिए इनर्शियल नेविगेशन, सैटेलाइट नेविगेशन, टेरेन रेफरेंस और आधुनिक टर्मिनल सीकर जैसी तकनीकों का बेहतर संयोजन जरूरी होगा. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की स्थिति में लक्ष्य तक पहुंचने और सही लक्ष्य की पहचान करने के लिए ऑनबोर्ड कंप्यूटिंग तथा उन्नत सॉफ्टवेयर की भूमिका भी बढ़ेगी.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…
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