10वीं मुहर्रम पर हजरत इमाम हुसैन और शोहदा-ए-कर्बला की याद में अंजुमन जाफरिया की ओर से ऐतिहासिक ‘जुलूस-ए-आशूर’ निकाला गया। शुक्रवार को जुमा की नमाज के बाद मस्जिद जाफरिया से शुरू हुए इस जुलूस का नेतृत्व अंजुमन जाफरिया के मातमी दस्ते ने बेहद अनुशासित ढंग से किया। जुलूस से पूर्व मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना सैयद तहजीबुल हसन रिजवी ने कहा, “इमाम हुसैन की शहादत जुल्म के खिलाफ हक, इंसाफ और इंसानियत की जीत का प्रतीक है। वाक्या-ए-कर्बला हमें सिखाता है कि किसी भी हाल में अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहिए। यजीद अपनी विशाल सेना के बावजूद हक को परास्त नहीं कर सका, जबकि इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने अल्लाह पर भरोसा रखकर सत्य की रक्षा के लिए जान कुर्बान कर दी और अमर हो गए। मौलाना रिजवी ने देशप्रेम पर जोर देते हुए कहा कि मुहर्रम हमें अमन, भाईचारा और वतन से मोहब्बत का पैगाम देता है। देश के प्रति वफादारी भी एक बड़ी इबादत है। भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारा पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। जंजीरी मातम और देशप्रेम का पैगाम मजलिस के बाद पारंपरिक ताबूत, अलम और झूला निकाला गया। विक्रांत चौक पर अजादारों ने पुरसोज नौहाख्वानी की और सीना-जनी व जंजीरी मातम कर अपनी अकीदत का इजहार किया। जुलूस में मशहूर नौहाख्वान अमीर गोपालपुरी, कासिम अली और असगर अली ने कलाम पेश किए। इस दौरान अमीर गोपालपुरी ने वतन से मोहब्बत पर आधारित एक विशेष नौहा पेश किया। मातमी जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से होते हुए टैक्सी स्टैंड पहुंचा। यहां जिला प्रशासन, सेंट्रल मुहर्रम कमेटी, श्री महावीर मंडल, अंजुमन इस्लामिया रांची समेत विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक संगठनों ने जुलूस का स्वागत किया। मौके पर सैयद शाहरुख हसन रिजवी, जसीम रिजवी, नदीम रिजवी, डॉ. मुबारक अब्बास, एस.एच. फातमी, अकिलुर्रहमान, मो. इस्लाम, मो. आफताब, सुहैल सईद, तारिक इमरान, सागर कुमार, जय सिंह यादव समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
Source link