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Jharkhand High Court News: झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 11 किलो गांजा रखने के मामले में सात साल की सजा को रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि फॉरेंसिक जांच में बरामद पदार्थ गांजा नहीं बल्कि भांग निकला, जो NDPS एक्ट के तहत प्रतिबंधित ‘कैनाबिस’ की परिभाषा में शामिल नहीं है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल भांग रखने को इस कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता.
झारखंड हाईकोर्ट ने 11 किलो गांजा रखने के जुर्म में सात साल की सजा पाए शख्स को बरी कर दिया.
करीब 26 साल तक अदालतों में चले एक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया, जिसने NDPS एक्ट के तहत दर्ज मामलों की कानूनी व्याख्या पर नई चर्चा छेड़ दी है. जिस व्यक्ति को 11 किलो गांजा रखने के आरोप में सात साल की सजा सुनाई गई थी, उसे हाईकोर्ट ने यह कहते हुए बरी कर दिया कि पुलिस जिस पदार्थ को गांजा बता रही थी, वह फॉरेंसिक जांच में भांग निकला. और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट की नजर में भांग और गांजा एक जैसी श्रेणी में नहीं आते. ऐसे में केवल भांग रखने पर इस कानून के तहत अपराध नहीं बनता.
यह मामला अक्टूबर 2000 का है. पुलिस गश्त के दौरान एक व्यक्ति को भारी ब्रीफकेस के साथ संदिग्ध हालत में देखा गया. पुलिस के रोकने पर वह भागने लगा, लेकिन पीछा करके उसे पकड़ लिया गया. तलाशी के दौरान उसके ब्रीफकेस से 12 पॉलीथिन पैकेट बरामद हुए, जिनमें करीब 11 किलोग्राम संदिग्ध पदार्थ था. पुलिस ने इसे गांजा मानते हुए NDPS एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया.
बाद में ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2009 में शख्स को दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास और 50 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई. हालांकि मुकदमे के दौरान आई फोरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट ने पूरा केस ही पलट दिया. रिपोर्ट से पता चला कि शख्स के पास से जब्त पदार्थ गांजा नहीं, बल्कि भांग था.
इसी आधार पर आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की. सुनवाई के दौरान अदालत ने NDPS एक्ट की धारा 2(iii) का विस्तृत परीक्षण किया, जिसमें ‘कैनाबिस (हेम्प)’ की परिभाषा दी गई है. अदालत ने कहा कि इस परिभाषा में चरस, गांजा और इनके मिश्रण को शामिल किया गया है, लेकिन भांग को इसमें शामिल नहीं किया गया है. कानून के अनुसार केवल पौधे की फूल या फल वाली ऊपरी शाखाएं ही गांजा मानी जाती हैं, जबकि पत्तियां और बीज, यदि वे अलग हों, तो इस परिभाषा में नहीं आते.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने अपने फैसले में कहा कि विभिन्न हाईकोर्ट पहले भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि भांग NDPS एक्ट के तहत प्रतिबंधित पदार्थ की श्रेणी में नहीं आता. अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने भी ऐसा कोई नियम या अधिसूचना जारी नहीं की है, जिससे भांग को इस कानून के तहत प्रतिबंधित पदार्थ घोषित किया गया हो.
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि मामले में आरोपी पर भांग या गांजा के पौधे की खेती करने का कोई आरोप नहीं था. चूंकि फॉरेंसिक रिपोर्ट में जब्त पदार्थ भांग साबित हुआ, इसलिए NDPS एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत दी गई सजा कानून की दृष्टि से टिक नहीं सकती. इन्हीं आधारों पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया और उसकी अपील स्वीकार कर ली.
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साद बिन उमर को पत्रकारिता के क्षेत्र में 15 साल से अधिक का अनुभव है, जिनमें से 12 साल उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता को दिए है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने आज तक, एनडीटीवी, पीटीआई और नया इंडिया जैसे प्र…और पढ़ें