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सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाके में आज भी किसान पारंपरिक तकनीक से धान कि खेती करते हैं ,किसान सबसे पहले खेत कि तैयारी करता है गहरी जुताई करता है ,इसके बाद धान का बीज बो दिया जाता है. पानी जैसे ही खेत में भरने लगते हैं बोये गए गाछी को फिर अलग से निदाई की जाती है.
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, यहां प्रत्येक किसान के यहां धान कि खेती होती ऐसे में सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाके में आज भी किसान पारंपरिक तकनीक से धान कि खेती करते हैं ,किसान सबसे पहले खेत कि तैयारी करता है गहरी जुताई करता है ,इसके बाद धान का बीज बो दिया जाता है. पानी जैसे ही खेत में भरने लगते हैं बोये गए गाछी को फिर अलग से निदाई की जाती है.
ये तकनीक को थारहा कहा जाता है.इसके बाद किसान खेत में गाछी को एक एक कर रोप देती हैं. जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में वृद्धि होती है. आप बोवाई के माध्यम से भी खेती कर सकते लेकिन रोपाई विधि से लाभ अधिक होगा. खेत में खतपतवार कि समस्या भी नहीं रहेगी फसल एक निश्चित दूरी पर लगेगा तो घने दाने आएंगे तो धान अच्छी होगी.
खेत की तैयारी से होती है शुरुआत
सुरेश यादव ने लोकल 18 को बताया कि धान की खेती की शुरुआत खेत की गहरी जुताई से होती है, इसके बाद खेत को समतल कर धान का बीज बोया जाता है, बारिश के पानी से जब खेत भर जाते हैं, तब बीज से तैयार हुई गाछी (धान की पौध) को रोपाई के लिए तैयार किया जाता है.
‘थरहा’ परंपरा आज भी कायम
सरगुजा के ग्रामीण क्षेत्रों में गाछी तैयार होने के बाद उसकी निराई-गुड़ाई की जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘थरहा’ कहा जाता है. इस प्रक्रिया से पौधे मजबूत होते हैं. रोपाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं.
रोपाई विधि से मिलता है अधिक लाभ
गाछी तैयार होने के बाद किसान और महिलाएं खेत में एक-एक पौधे की निश्चित दूरी पर रोपाई करते हैं, किसानों का कहना है कि इस विधि से पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है, जिससे उनकीबढ़वार अच्छी होती है और बालियों में दानों की संख्या भी अधिक आती है.
खरपतवार कम, उत्पादन ज्यादा
विशेषज्ञों और किसानों के अनुसार रोपाई विधि से खेती करने पर खेत में खरपतवार कम उगते हैं. साथ ही पौधों को पर्याप्त पोषण और धूप मिलने से फसल स्वस्थ रहती है. इससे धान की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है…
परंपरा और विज्ञान का संगम
हालांकि आज सीधे बुवाई की आधुनिक तकनीक भी उपलब्ध है, लेकिन सरगुजा के कई किसान बेहतर गुणवत्ता और अधिक उपज के लिए अब भी पारंपरिक रोपाई विधि को प्राथमिकता देते हैं.यही वजह है कि मानसून आते ही गांवों के खेतों में रोपाई का पारंपरिक नजारा देखने को मिलता है, जो छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति और विरासत को जीवंत बनाए हुए है…